Saturday, 19 April 2014

सिओल में अंतरराष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन-2014 संपन्न



13 से 15 मार्च 2014 तक हन्गुक यूनिवर्सिटी ऑफ फॉरेन स्टडीज, सिओल, दक्षिण कोरिया में अंतरराष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन आयोजित किया गया। इस 3 दिवसीय सम्मेलन का आयोजन विदेश मंत्रालय, भारत सरकार और भारतीय दूतावास, सिओल के सहयोग से किया गया।


सम्मेलन का उद्देश्य ऑस्ट्रेलिया, चीन, जापान, भारत और कोरिया समेत समस्त एशिया-प्रशांत क्षेत्र में हिन्दी भाषा के शिक्षण और अध्यापन को बढ़ावा देना था। दो दिन के 5 अकादमिक सत्रों में कुछ 18 आलेख पढ़े गए।

उद्घाटन समारोह का संचालन भारत अध्ययन विभाग से प्रोफेसर लिम गन दोंग ने किया। सिओल से कुछ दूर हन्गुक यू‍निवर्सिटी के ग्लोबल परिसर योंगिन में आयोजित सम्मेलन में स्वागत भाषण विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर किम इन छल ने ‍दिया। 

उद्घाटन संबोधन दक्षिण कोरिया में भारत के राजदूत महामहिम विष्णु प्रकाश ने दिया। हिन्दीसेवी सम्मान प्राप्तकर्ता और विभाग के प्रोफेसर एमेरिटस प्रोफेसर ली जंग हो ने 'भारत और हिन्दी की याद' शीर्षक स्मृति चि‍त्र प्रस्तुत किया।

पहले अकादमिक सत्र में 4 वक्ता थे। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा के पूर्व कुलपति विभूतिनारायण राय ने 'विदेशी भाषा के रूप में हिन्दी पढ़ाने में महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय का योगदान' शीर्षक आलेख पढ़ा।

ऑस्ट्रेलिया नेशनल यू‍निवर्सिटी से प्रोफेसर पीटर फ्रीडलैंडर ने 'ऑस्ट्रेलिया में हिन्दी : अतीत, वर्तमान और भविष्य' शीर्षक के अपने आलेख की पावर पॉइंट प्रस्तुति में ऑस्ट्रेलिया में हिन्दी शिक्षण के ऐतिहासिक विकास क्रम को स्पष्ट करते हुए विदेशी भाषा के रूप में हिन्दी अध्यापन के लिए टास्क बेस्ड लर्निंग, ऑडियो-लिंगुअल और कम्युन‍िकेटिव स्टाइल ऑफ टीचिंग की अवधारणा को रेखांकित किया।

तीसरी वक्ता के रूप में हन्गुक यू‍निवर्सिटी ऑफ फॉरेन स्टडीज से प्रोफेसर विजया सती ने अपने आलेख 'बुदापैश्त में हिन्दी अध्यापन : कुछ स्मृतियाँ' में ऐलते विश्वविद्यालय, बुदापैश्त में अपने अध्यापन काल के अनुभव साझा किए। सत्र की अंतिम वक्ता हन्गुक यू‍निवर्सिटी ऑफ फॉरेन स्टडीज की प्रोफेसर किम ऊ जो ने 'दक्षिण कोरिया में हिन्दी शिक्षण : 40 वर्ष का सफर' शीर्षक अपने आलेख में कोरिया में हिन्दी शिक्षण के विकास को विस्तार सहित प्रस्तुत किया।

दूसरे अकादमिक सत्र में विषय रखा गया था- 'हिन्दी एवं उसका विकास'। अध्यक्षता एवं संचालन प्रो. छोई जोंग छान ने किया। प्रथम वक्ता के रूप में चीन के शिआन इंटरनेशनल स्टडीज विश्वविद्यालय से आए प्रो. गे फु‍पिंग ने 'भारतीय लोगों का सांस्कृतिक मनोविज्ञान और हिन्दी व्यवहार की विशेषताएँ' शीर्षक से आलेख पढ़ा। हन्गुक विश्वविद्यालय से डॉ. क्षिशतोफ इवानेक ने 'विद्या भारती स्कूलों में हिन्दी भाषा अध्यापन' पर आलेख पढ़ा। हन्गुक विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग से प्रो. हृदयनारायण के आलेख का शीर्षक था- 'हिन्दी और राष्ट्रवाद।' 

दूसरे दिन तीसरे अका‍दमिक स‍त्र में हन्गुक विश्वविद्यालय से प्रो. लिम गन दोंग ने 'हिन्दी शिक्षण में संस्कृत शिक्षा का योगदान', जापान के दाइताबुंका विश्वविद्यालय से प्रो. हिदेआकी इशिदा ने 'हिन्दी शिक्षण में लोककथाओं की उपयोग‍िता', दिल्ली विश्वविद्यालय से डॉ. सारस्वत मोहन मनीषी ने 'हिन्दी स‍ाहित्य शिक्षण में तुलसीदास की उपयोगिता' और पेकिंग विश्वविद्यालय के दक्षिण एशियाई अध्ययन केंद्र के निदेशक प्रो. जियांग कुई ने 'भारतीय ग्रंथों का चीनी भाषा में अनुवाद' शीर्षक आलेख पढ़े।

चौथे अकादमिक सत्र में पहला आलेख प्रो. फुजिइ ताकेशी ने प्रस्तुत किया, जो टोकियो यूनिवर्सिटी ऑफ फॉरेन स्टडीज से थे, शीर्षक था- 'डिजिटल युग में हिन्दी भाषा और साहित्य का अध्ययन- अध्यापन'।

हन्गुक विश्वविद्यालय के प्रो. ली उन गू ने ‍'हिन्दी फिल्मी ‍गीतों के माध्यम से हिन्दी शिक्षण' विषय पर अपने विचार रखे। प्रो. रामबक्ष के आलेख का शीर्षक था- 'भूमंडलीकरण और हिन्दी का अध्ययन।'

पांचवें अंतिम सत्र में प्रथम वक्ता केंद्रीय हिन्दी संस्थान भारत से प्रो. मोहन ने 'हिन्दी सीखने वाले कोरियाई विद्यार्थियों का अधिगम-व्यवहार और अपेक्षाएँ' शीर्षक से अपनी बात कही।

ओसाका विश्वविद्यालय जापान से प्रो. चिहिरो कोइसो ने 'हिन्दी शिक्षा में पढ़ने वालों की अभिप्रेरणा कैसे बढ़नी चाहिए' विषय पर संवाद किया। खो थे जीन बुसान विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग से थे जिन्होंने 'कोरिया में हिन्दी : अध्यापन एक अनुभव' शीर्षक से वक्तव्य दिया। प्रो. हु रुई ग्वांगदोंग विदेश अध्ययन विश्वविद्यालय चीन से आए थे और उन्होंने 'अभाव पूर्ति सिद्धांत की दृष्टि से हिन्दी शिक्षा पर कुछ विचार' प्रस्तुत किए।

सम्मेलन के समापन समारोह की अध्यक्षता और संचालन हन्गुक विश्वविद्यालय से प्रो. किम ऊ जो ने किया जिसमें पहले सभी अकादमिक सत्रों की संक्षिप्त रिपोर्ट प्रो. मोहन और प्रो. पीटर फ्रीहलैंडर ने प्रस्तुत की। समापन वक्तव्य उपसचिव, विदेश मंत्रालय, सुनीति शर्मा और भारतीय दूतावास सिओल के भारतीय सांस्कृतिक केंद्र की निदेशक निहारिका सिंह ने दिया।
प्रस्तु‍ति : विजया सती

Thursday, 5 September 2013

प्रथम हिन्दी>अंग्रेजी व्याकरण के लेखक नहीं रहे

नहीं रहे प्रो. Ronald Stuart McGregor : कविता वाचक्नवी


प्रथम हिन्दी>अंग्रेजी व्याकरण के लेखक तथा हिन्दी भाषा व साहित्य के क्षेत्र में ऐतिहासिक योगदान करने वाले Prof. Ronald Stuart McGregor (केम्ब्रिज वि. वि.) नहीं रहे। 19 अगस्त को उनका स्वर्गवास हो गया। 

 न्यूजीलैंड में जन्मे व स्कॉटिश माता-पिता की सन्तान प्रो. McGregor को बालपन में फ़िजी से प्रकाशित हिन्दी के एक व्याकरण की प्रति किसी ने दी थी, जिसने उनके जीवन का रुख हिन्दी की ओर मोड़ दिया। 1964 से 1997 तक में वे केम्ब्रिज विश्वविद्यालय में हिन्दी पढ़ाते रहे। सर्वप्रथम 1959-60 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हिन्दी की पढ़ाई करने वे भारत आए थे।

 उनका पीएच.डी. शोध 1968 में पुस्तकाकार प्रकाशित हुआ था, जिसका शीर्षक था "The Language of Indrajit of Orchā - A Study of Early Braj Bhāsā Prose"। ( ध्यातव्य है कि इंद्रजीत स्वयं ब्रज भाषा के ख्यात कवि थे और वे ही प्रसिद्ध कवि केशवदास के संरक्षक भी थे )।  

यह हिन्दी का दुर्भाग्य है कि इस भाषा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित करवाने वाले एक विद्वान के निधन पर हिन्दी क्षेत्र में किसी ने एक शब्द तक 20 दिन में नहीं लिखा, यद्यपि भारत के एक अंग्रेजी समाचारपत्र में अंग्रेजी के पूर्व प्रोफेसर (दिल्ली वि. वि.) ने एक लेख अवश्य लिखा है। उस लेख को भी यहाँ अंत में पढ़ा जा सकता है ।


उनकी कुछ कृतियों की सूची यों है
  • 1) -The Oxford Hindi-English Dictionary / published 1993 — 2 editions
  • 2) - Shorter Oxford English Dictionary by R.S. McGregor, Lesley Brown (Editor) / published 2002  
  • 3) - Outline of Hindi Grammar: With Exercises / published 1972 — 5 editions  
  • 4) - Exrcss Spoken Hindi Cassette 
  • 5) - Devotional Literature in South Asia /published 1992 — 2 editions
  • 6) - The Language of Indrajit of Orch: A Study of Early Braj Bhāsā Prose (University of Cambridge Oriental Publication / published 1968 — 2 editions  
  • 7) - Exercises In Spoken Hindi by R.S. McGregor, A. S. Kalsi / published 1971  
  • 8) -The Round Dance Of Krishna, And Uddhav's Message by NandDas, R.S. McGregor / published 1974












प्रो. Ronald Stuart McGregor विषयक एक लेख नीचे देखेँ -


The storyteller of Hindi 
Harish Trivedi : Sat Aug 31 2013, 04:23 hrshttp://www.indianexpress.com/news/the-storyteller-of-hindi/1162437/0

McGregor chronicled the emergence of Hindi as the great popular language of north India.Ronald Stuart MCGREGOR taught Hindi at the University of Cambridge from 1964 to 1997, and was a fellow of Wolfson College there until he passed away on August 19. He had earlier taught at the School of Oriental and African Studies at the University of London. A philologist, grammarian, literary historian, translator and lexicographer of the front rank, he probably did more for Hindi studies in the West than any other scholar of his generation.

McGregor was born of Scottish parents in New Zealand, where he took his BA in English. On a scholarship to Oxford, he studied early English philology but then turned to learning Hindi, a language to which he dedicated the rest of his life. He had, as a teenager in New Zealand, been given a copy of a Hindi grammar book published in neighbouring Fiji, where migrant Indians formed a large part of the population. That wind-blown seed grew into a mighty tree.
McGregor first visited India in 1959-60 to study Hindi at the University of Allahabad. He had already met in London a student of Indian history, Elaine, who was now researching at Calcutta; they got married there in 1960.

McGregor's PhD thesis was published as The Language of Indrajit of Orchha (1968). No one had heard of this Indrajit, a minor prince who was a patron of the major poet Keshav Das (1555-1617) but also himself a pioneering writer of prose in Braj bhasha. This early discovery was characteristic of McGregor's scholarly method: not to lose sight of the minor in the glare of the canonical, and to see the text in its wider context, including its vital social and cultural affiliations.

As a pioneering language teacher, McGregor produced next An Outline of Hindi Grammar (1972, revised ed. 1995), which remains a standard work of reference. He then contributed to a multi-volume History of Indian Literature not one, but two volumes on Hindi literature, the first on the 19th and the early 20th centuries (1974), and the second, from the beginning to the 19th century (1984). Together, they constitute probably the most authoritative history of Hindi literature yet available in English.

In these volumes, McGregor sought to modify the periodisation of Hindi literature which Ramchandra Shukla had put in place in his foundational and still canonical history (1929). He gave more space to the early period and paid the same kind of nuanced attention to some minor poets such as Nand Das (whose major works he translated), Vishnu Das and Bhikhari Das as he did to Kabir, Meera or Tulsi.

The work that McGregor is most widely identified with began modestly enough, when the Oxford University Press asked him to update the classic Dictionary of Urdu, Classical Hindi, and English (1884) by John T. Platts. Like many famous sequels, it soon assumed a divergent life of its own. As McGregor noted, the priority and ascendancy of Urdu had long since vanished, there had meanwhile appeared a huge new dictionary, the Hindi Shabd Sagar (1922-29), and altogether, Hindi had "developed dramatically in scope, status and literary versatility". McGregor's Oxford Hindi-English Dictionary (1993), which was 20 years in the making, now stands supreme as the ultimate go-to resource of its kind. Whenever any Hindi-English bilingual is in doubt or distress, she can do no better than "look up McGregor".

His last significant work, a 45-page essay on the "Progress of Hindi" from the 14th to the 19th century (in Literary Cultures in History, edited by Sheldon Pollock, 2003), is in a sense a fine distillation of McGregor's life's work, his gaagar mein saagar (the ocean in an earthen pot). He highlighted here the abiding vitality of Hindi in small but culturally confident centres such as Dalmau, Gwalior, the "Braj district", Orchha and Banaras (in implicit contrast with the metropolitan Persian-Urdu centres of Delhi, Lucknow and Lahore), and the emergence of Hindi finally as the great popular language of north India.

In his dictionary too, McGregor had weaned colonial "Hindustani" lexicography away from its Perso-Arabic genealogy, to ground Hindi meticulously in its etymological basis in Sanskrit and in its vast tadbhava resources of indigenous dialects. Instead of a composite culture, he spoke, acutely and perhaps more accurately, of a "cultural rapprochement" and of a "bipartite culture".
Stuart McGregor was a gentle and modest man, always quietly dedicated to his work. At the end of a lecture I once gave in Cambridge, he took me aside to diffidently ask of me a favour: to find in Delhi and send him a particular Hindi-to-Hindi dictionary that he needed. He graciously acknowledged the receipt of the book in the form of a self-composed doha in Braj bhasha, to express a feeling we could not have shared in English. He was more deeply steeped in Hindi sensibility and literature than many of its contemporary native speakers are, and he did as much to propagate and promote Hindi as anyone.
The writer is a former professor of English, University of Delhi

Wednesday, 27 March 2013

भारतीय उच्चायोग, लन्दन द्वारा “सम्मान-समारोह" संपन्न


डॉ.कविता वाचक्नवी को ‘आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी पत्रकारिता सम्मान’ प्रदत्त

लन्दन स्थित भारतीय उच्चायुक्त डॉ जैमिनी भगवती से आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी पत्रकारिता सम्मान प्राप्त करते हुए डॉ. कविता वाचक्नवी.

ब्रिटेन के विभिन्न नगरों से आए लेखक, पत्रकार तथा कला एवं साहित्य क्षेत्र के प्रतिष्ठित अतिथिगण. 


डॉ. कविता वाचक्नवी को प्रदत्त स्मृतिचिह्न और प्रशस्तिपत्र

 डॉ. कविता वाचक्नवी को  स्मृतिचिह्न भेंट करते हुए भारतीय उच्चायुक्त डॉ जैमिनी भगवती. 

 “जॉन गिलक्रिस्ट हिन्दी शिक्षण सम्मान” प्राप्त करते हुए प्रो. महेंद्र किशोर वर्मा

डॉ. कविता वाचक्नवी को प्रदत्त प्रशस्ति-पत्र

भारतीय उच्चायोग, लंदन द्वारा

 “ सम्मान-समारोह"

 सम्पन्न 

24 मार्च 2013

भारतीय जीवन मूल्यों के वैश्विक प्रचार-प्रसार की संस्था “विश्वम्भरा” की संस्थापक-महासचिव डॉ.कविता वाचक्नवी को विश्व हिन्दी दिवस के उपलक्ष्य में भारतीय उच्चायोग, लंदन द्वारा इण्डिया हाउस में आयोजित समारोह में “आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी पत्रकारिता सम्मान” किया गया। इस अवसर पर भारत के उच्चायुक्त महामहिम डा. जे॰ भगवती ने उन्हें नकद राशि, स्मृति चिह्न, शॉल और प्रशस्ति पत्र प्रदान किए। उन्हें यह सम्मान मुख्यतः इन्टरनेट व प्रिंट मीडिया द्वारा भाषा, साहित्य, संस्कृति व पत्रकारिता के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान के लिए दिया गया है.


उल्लेखनीय है कि अमृतसर में जन्मीं कविता वाचक्नवी समाज-भाषा-विज्ञान तथा काव्यसमीक्षा जैसे विषयों में 'दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा, हैदराबाद' से एमफिल और पीएचडी अर्जित करने के बाद सपरिवार लन्दन में रह रही हैं. भारतीय उच्चायोग द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में बताया गया है कि "आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी पत्रकारिता सम्मान" ग्रहण करते हुए डॉ कविता वाचक्नवी ने अपने दादाश्री व पिताश्री का विशेष उल्लेख किया व लाहौर से हिमाचल और पंजाब तक उनके किए कार्यों व बलिदानों को उपस्थितों के साथ बाँटते हुए बताया कि कैसे हिन्दी सत्याग्रह में जेल में रहने से लेकर हिमाचल को हिन्दीभाषी राज्य का दर्जा दिलाने तक के लिए उनके परिवार ने कष्ट सहे। वाचक्नवी ने अपना सम्मान उन्हीं को समर्पित करते हुए कहा कि वे यह सम्मान उनके प्रतिनिधि के रूप में ग्रहण कर रही हैं। उन्होंने राजदूत व उच्चायोग से अनुरोध किया कि ब्रिटेन में भारतीय उच्चायोग की वेबसाईट को द्विभाषी बनाया जाना चाहिए व उसे अंग्रेजी के साथ साथ हिन्दी में भी उपलब्ध होना चाहिए।


विज्ञप्ति के अनुसार इस समारोह में दो अन्य विशिष्ट हिंदी सेवियों तथा एक हिंदी संस्था को भी सम्मान प्रदान किए गए. “जॉन गिलक्रिस्ट हिन्दी शिक्षण सम्मान” से यॉर्क विश्वविद्यालय के विख्यात भाषाविद प्रो. महेंद्र किशोर वर्मा को तथा “डा॰ हरिवंश राय बच्चन हिन्दी साहित्य सम्मान” से बर्मिंघम के हिंदी लेखक डॉ॰ कृष्ण कुमार को सम्मानित किया गया जबकि नाटिङ्घम की संस्था “काव्य रंग” को “फ़्रेडरिक पिनकोट हिन्दी प्रचार सम्मान” प्रदान किया गया.


इस अवसर पर सम्मानितों को बधाई देते हुए सभा को संबोधित अपना वक्तव्य हिन्दी में देते हुए उच्चायुक्त डॉ जैमिनी भगवती ने कहा कि वे स्वयं असमिया भाषी होते हुए दिल्ली में रहने के कारण हिन्दी में व्यवहार करते रहे हैं व उनकी शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी रही है। उन्होने ज़ोर देकर कहा कि निजी रूप से वे त्रिभाषा नीति को भारत के लिए श्रेयस्कर समझते हैं। विश्व पटल पर भारत से बाहर के लोगों के लिए अंग्रेजी, समस्त भारतीय कार्यकलापों के लिए हिन्दी व अपनी मातृभाषा अथवा एक प्रांतीय भाषा प्रत्येक भारतीय को अवश्य सीखनी पढ़नी चाहिए।


“जॉन गिलक्रिस्ट यू.के.हिन्दी शिक्षण सम्मान” स्वीकार करते हुए प्रो. महेंद्र किशोर वर्मा ने अपने वक्तव्य में यॉर्क विश्वविद्यालय में सर्वप्रथम हिन्दी अध्यापन प्रारम्भ होने सम्बन्धी अपने संस्मरण सुनाए और यूके में हिन्दी अध्यापन से जुड़ी स्थितियों का उल्लेख करते हुए 35 वर्ष के अध्यापन का उल्लेख किया। इसी प्रकार "डॉ. हरिवंश राय बच्चन हिंदी साहित्य सम्मान" ग्रहण करते हुए डॉ. कृष्ण कुमार ने भारत में संस्कृत, हिंदी और दूसरी क्षेत्रीय भाषाओं को बढ़ावा देने के लिए भावपूर्ण अपील करते हुए चेतावनी दी कि ऐसा नहीं करने पर आने वाले दिनों में भारत को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।


समारोह में “डॉ. लक्ष्मीमल सिंघवी प्रकाशन अनुदान योजना” के अंतर्गत श्रीमती उषा वर्मा को उनकी पुस्तक 'सिम कार्ड तथा अन्य कहानियाँ’ और डा॰ कृष्ण कन्हैया को उनके काव्य संग्रह 'किताब जिंदगी की’ के प्रकाशन हेतु नकद राशि और मानपत्र दिया गया।


लंदन स्थित इंडिया हाउस में हुए इस पुरस्कार समारोह में उप उच्चायुक्त डॉ. वीरेंद्र पाल और उच्चायोग में मंत्री (समन्वय) एसएस सिद्धू भी उपस्थित थे। सिद्धू जी ने अपना स्वागत वक्तव्य हिन्दी में दिया व धन्यवाद वक्तव्य भी डॉ वीरेंद्र पॉल द्वारा हिन्दी में ही दिया गया। कार्यक्रम का संचालन उच्चायोग के हिन्दी व संस्कृति अताशे श्री बिनोद कुमार ने सफलतापूर्वक किया। ब्रिटेन के विभिन्न नगरों से आए लेखक, पत्रकार तथा कला एवं साहित्य क्षेत्र के भारतीय मूल के लोग बड़ी संख्या में समारोह में उपस्थित थे ।

चित्र परिचय –
  • 1. लन्दन स्थित भारतीय उच्चायुक्त डॉ जैमिनी भगवती से आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी पत्रकारिता सम्मान प्राप्त करते हुए डॉ. कविता वाचक्नवी.
  • 2. ब्रिटेन के विभिन्न नगरों से आए लेखक, पत्रकार तथा कला एवं साहित्य क्षेत्र के प्रतिष्ठित अतिथिगण.
  • 3. डॉ. कविता वाचक्नवी को प्रशस्तिपत्र और स्मृतिचिह्न भेंट करते हुए भारतीय उच्चायुक्त डॉ जैमिनी भगवती.
  • 4. “जॉन गिलक्रिस्ट हिन्दी शिक्षण सम्मान” प्राप्त करते हुए प्रो. महेंद्र किशोर वर्मा.
[प्रेषक – डॉ. ऋषभदेव शर्मा (संवीक्षक – ‘विश्वम्भरा’), प्रोफ़ेसर एवं अध्यक्ष, उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, खैरताबाद, हैदराबाद-500004; मोबाइल – 08121435033]  

Wednesday, 12 December 2012

प्रवासी हिंदी एवं प्रवासी साहित्य के अन्तर्सम्बन्ध

डॉ. कृष्ण कुमार



इतिहास इस बात का साक्षी है कि उन्नीसवीं सदी से लेकर अब तक जिन देशों में भी प्रवासी भारतीयों ने अपने घर बनाए वे भौतिकरूप से हर मामले में सफल रहे हैं । इनके मुख्य कारण इनकी मेहनत, लगन, निष्ठा एवं आस्था ही रहे हैं । भले ही रंगभेद के कारण उनके साथ अमानवीय व्यवहार भी हुए किंतु उन्होंने भौतिकरूप से अपने को सुखी बनाया और धनी हुए । मॉरिशस, सूरिनाम, गयाना, ट्रिनिडाड, फीजी और दक्षिण अफ्रीका में बसे प्रवासी भारतीयों को शासकों के अमानवीय व्यवहार जब असह्य हो गए तब उन्होंने सामूहिक रूप से भारतीय सरकार से हस्तक्षेप करने की प्रार्थना की, गुहार लगाई । तत्कालीन भारत सरकार ने भी अमानवीय, संवेदनहीन, राजनीतिक निर्णय लेकर सहायता देने में अपनी असमर्थता व्यक्त की । ये प्रवासी तिलमिला गए यह जानकर कि जननी ने भी अपने नैतिक-मौलिक धर्म का निर्वाह न किया । तब से हर प्रवासी भारतीय भावात्मक रूप से अपने पुरखों की जन्मभूमि से कटता रहा ।


1950 के बाद विदेशों में जाकर बसने वाले भारतीय भिन्न श्रेणी में आते हैं । वे सुशिक्षित, पढ़े-लिखे, जागरूक होते हुए धनोपार्जन सहित अन्य कई उद्देश्यों से प्रवासी  बने थे । ये अपने साथ अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए रामायण, हनुमान चालीसा या गीता नहीं वरन् अपने मौलिक अधिकारों का ज्ञान लेकर गए थे । इसके बावजूद मनोवैज्ञानिक स्तर पर इनकी हालत भी एकसा थी और आज भी है । हर प्रवासी को यह समझने में थोड़ा समय लगता है कि भौतिक सुख सुविधाओं को प्राप्त करने के लिए उन्होंने क्या-क्या खोया है और किन-किन मौलिक दायित्वों का हनन हुआ है । ये भाव महेश भट्ट द्वारा निर्देशित चलचित्र ‘‘नाम’’ में आनन्द बक्शी के मार्मिक गीत के माध्यम से बड़े ही सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया गया हैः


सात समुन्दर पार गया तू, हमको जिंदा मार गया तू
पहले जब तू खत लिखता था, कागज में चेहरा दिखता था
तेरी बीबी करती है सेवा, सूरत से लगती है बेवा
आजा उमर बहुत है छोटी, अपने घर में भी है रोटी


प्रवासी भारतीयों एवं उनसे बिछड़े भारत में ही छूटे परिजनों की पीड़ा एवं दर्द को वे ही समझ सकते हैं जिनको इसका व्यक्तिगत अनुभव हुआ हो । राजेन्द्र यादव सरीखे, इस क्षेत्र में, अल्पअनुभवी या अनुभवहीन वामपंथी भारतीय आलोचकों ने प्रवासी रचनाकारों की आत्मा को बहुत कष्ट दिया है और देते ही जा रहे है । दोष ऐसे व्यक्तियों का नहीं वरन् उनकी अज्ञानता और हठ का है जिसके कारण वे वास्तविकता देख ही नहीं पाते हैं । उदाहरण के लिए शब्दयोग के अप्रैल 2008 (4) में गोयनका जी ने उद्धृत किया है कि ‘‘राजेन्द्र यादव ने ‘हंस’ के मई 2007 के अंक में जो सम्पादकीय लिखा है उसमें तो यहाँ तक लिखा है कि यह बीजेपी वाला साहित्य है, आधुनिकता से शून्य है और भारत जैसे साहित्यिक मुहावरे का पूर्णतः अभाव है । खेदजनक है कि ये मार्क्सवादी प्रवासी भारतवंशियों के इतिहास को नहीं जानते और यदि जानते हैं तो उसका उल्लेख नहीं करते ।’’


राजेन्द्र यादव एक अर्से से प्रवासी साहित्य को ‘नास्टालजिया’ का साहित्य कहते रहे हैं और उनकी धुन में धुन मिलाते ऐसे लोग भी जुड़ते रहे जिनके पास कुछ मौलिक कहने का अभाव रहा है । इन लोगों को सम्भवतः यह भी नहीं मालूम कि साहित्य का सृजन मस्तिष्क के मंथन से, चिंतन और चेतना के सम्भोग से, व्यष्टि और समष्टि के बीच विवेक से होता है । समस्या का अंत यहीं नहीं हो जाता क्योंकि कुछ चुनिंदा अवसरवादी प्रवासी रचनाकार, जिनकी तमाम कारणों से भारत के साहित्यिक गलियारों में कुछ पहचान बन गई है, अपनी रचनाओं को प्रवासी न घोषित कर तथाकथित भारत की मुख्यधारा से ही जुड़ा मानना चाहते हैं । ऐसे प्रवासी रचनाकार, भारत में पाठ्यक्रम निर्माताओं से यह विनती करते सुने गए हैं  कि वे उनकी रचनाओं को भी सम्मिलित करें । ऐसा करना कहाँ तक साहित्य या साहित्यकार के कैसे विचारों को परिलक्षित करता है, बहुत कठिन नहीं है समझ पाना । ऐसी रचनाओं का तथाकथित मुख्यधारा में होना न होने के बराबर है । गंगा की धारा गंगा ही कहलाती है । बात है भावात्मक जुड़ाव की । मॉरिशस के ‘परी तालाब’  में जगह-जगह से गंगाजल ला कर वहाँ के लोगों ने ‘गंगा तालाब’ को जन्म दिया और अब सारे संस्कार वहीं होते हैं, यह समझ कर कि गंगा ही वहाँ पहुच गई है । अधिकतर ऐसे प्रवासी दो नावों में सफर करना चाहते हुए भ्रमित हो रहे हैं । अंत क्या होगा ऐसे लोगों का, समय ही बताएगा । ऐसे रचनाकार भी अब, पिछले तीन-चार सालों में, कुछ भारतीय साहित्यकारों के स्वर में स्वर मिलाने लगे हैं कि ‘प्रवासी हिंदी साहित्य’ नाम की कोई चीज ही नहीं है और हिंदी में की गई प्रवासी रचनाओं को केवल हिंदी साहित्य के अन्तर्गत ही रखना चाहिए । कुछ प्रवासी रचनाकार ऐसा क्यों करने लगे हैं इसका मुख्य कारण है कि वामपंथी आलोचक प्रवासी रचनाओं को-अधकचरा, अपरिपक्व, भाषा-शैली से कमजोर, गटर तथा कचरा साहित्य करार कर चुके हैं । ऐसे प्रवासी रचनाकार अनजाने में उभरते प्रवासी रचनाकारों के भविष्य को क्षति  पहुँचा रहे हैं । राजेन्द्र यादव सरीखे व्यक्ति सम्भवतः यह चाहते हैं कि सब उनका अनुकरण कर वही करें जो उन्होंने ‘हंस’ जैसी पवित्र पत्रिका के साथ किया । समय आ गया है जब प्रवासी रचनाकारों को ऐसे लोगों का बहिष्कार कर अपनी पहचान अपने ढंग से बनानी चाहिए ।


2005 के बाद, अब स्थिति बदल रही है और कुछ सीमा तक बदल चुकी है । प्रवासी हिंदी साहित्य का स्वागत हो रहा है और उनके योगदान को विभिन्न तरीके से सराहा भी जा रहा है । उनकी रचनाओं को भारत में लोग पढ़ना चाहते हैं । विश्वविद्यालयों में स्नातकोत्तर स्तर पर पढ़ाई हो रही । प्रवासी साहित्य और ऐसे रचनाकारों पर शोध हो रहे हैं । यही कारण है कि विभिन्न स्थापित-प्रतिष्ठित पत्रिकाओं द्वारा प्रवासी हिंदी साहित्य पर विशेषांक एवं महाविशेषांक  प्रकाशित हो रहे हैं । गोयनका जी ने स्पष्ट किया है कि यह ‘आरक्षण कोटे’ के अंदर नहीं हो रहा है वरन् वैसे ही हो रहा है जैसे त्रिलोचन, विष्णु प्रभाकर, बच्चन, शिव मंगल सिंह ‘सुमन’, धनीराम ‘प्रेम’, तिलका माझी, प्रेमचन्द्र, निराला आदि पर निकले विशेषांक । प्रवासी हिंदी साहित्य का यह प्रारम्भिक रूप है जो अपनी जड़े जमा रहा है और शीघ्र ही तथाकथित हिंदी की मुख्यधारा में अनेकानेक प्रवासी रचनाकारों का समावेश होगा । वे अपने कृतित्व के आधार पर अधिकार सहित उसमें अपनी जगह लेंगे, न कि माँग कर । माँगने पर लोग आजकल भीख भी नहीं देते । समय बदल गया है । इस विषय पर चर्चा हम बाद में भी करेंगे ।


प्रवास एवं इसके विभिन्न स्वरूपों के साथ अनेकानेक भ्रांतियाँ फैल चुकी हैं । यहाँ तक कि इसके सही एवं व्यापक अर्थ को सीमित कर अब केवल ‘विदेश में रहने वाले को ही’ प्रवासी समझा जाने लगा है । कुछ साहित्यकार बन्धुओं के अनुसार, गलत होते हुए भी, प्रवासी शब्द का, यह अर्थ अब रूढ़ हो गया है । दुख एवं डर दोनों है कि किस प्रकार गलत चीजों को सही मानकर लोग चलने लगते हैं । यह रस्सी को साँप समझने के बराबर है । इस शब्द से जुड़े अनेकानेक दुष्प्रयोगों के बारे में अन्यत्र विस्तार से लिखा जा चुका है (1,2) । उदाहरण के लिए ‘प्रवास‘ के स्थान पर ‘अप्रवास’ या ‘प्रवासी’ के स्थान पर ‘अप्रवासी’ शब्द का प्रयोग । इनका कोई अस्तित्व है ही नहीं, न शब्दकोशों में ही पाए जाते हैं । कभी कहीं किसी बड़े रचनाकार की रचना में यह गलत छप गया होगा । और तब से सबने मान लिया होगा कि यही वास्तविक शब्द है । यह ‘महाजनो येन गतः स पन्था:’ की तरह है । किंतु अब यह काम अज्ञानतावश एवं लापरवाही के कारण अच्छे-अच्छे रचनाकार, सम्पादक तथा प्रकाशक आदि अबाध गति से निरंतर करते जा रहे हैं । साहित्य के साथ ऐसी चुहल दु:खद होते हुए निंदनीय भी है ।


असीमित आकाश की तरह विचारों की उड़ान एवं तत्जनित साहित्य भी अनन्त होता है । किंतु साहित्य को स्वरूप देने वाले विषयों की सीमाएँ होती हैं । इस आलेख की आधारभूत रेखा एवं सीमा का निर्धारण आवश्यक है । वास्तव में आलेख का वैचारिक जन्म 2011 की जूलाई में हुआ था जब एक मकड़जाल पर पंजाब विश्वविद्यालय की एक शोधार्थीने अपने ‘प्रवासी हिंदी साहित्य’ से सम्बंधित शोध के लिए कुछ सहायता की अपेक्षा की थी । अनेकानेक लोगों ने तत्काल दिशा निर्देशन करना प्रारम्भ कर दिया । पहले चर्चा तो स्वस्थ, सार्थक एवं लाभप्रद रही किंतु शीघ्र ही इस परिचर्चा ने भी वही रूप ले लिया जो दुर्भाग्यवश ऐसे मकड़जालों पर होता है । समष्टि से सिमट कर यह व्यष्टि तक सीमित रह गई । विषय से हट कर लोग व्यक्तियों के व्यक्तित्व पर आने लगे । प्रवासी हिंदी साहित्य से जुड़े जो प्रश्न इसमें उठाए गए थे और समय-समय पर उठते रहे हैं उन्ही के समाधान का एक विनम्र प्रयास इस आलेख में किया गया है । मुख्य बिन्दु कुछ इस प्रकार हैं -

1. व्यक्ति प्रवासी होता है उसकी भाषा नहीं अतः क्या प्रवासी रचनाकारों की कृतियों को ‘प्रवासी हिंदी साहित्य’ के रूप में स्वीकार करना चाहिए ?

2. क्या प्रवासी हिंदी साहित्य को केवल हिंदी साहित्य कह कर हिंदी के महासागर में ही रखना चाहिए ? क्या इसको हिंदी का होते हुए एक अलग पहचान देने या मिलने की आवश्यकता नहीं है ?

3. क्या प्रवासी रचनाकार हिंदी की तथाकथित ‘मुख्यधारा’ से चिपक कर रहना चाहता है ? अगर हाँ तो क्यों ?

4. हिंदी के अलावा अन्य भाषाओं में भी रचनाकारों ने प्रवास में रचनाधर्मिता को कायम रखा है तो फिर उनके साहित्य को ‘प्रवासी अंग्रेजी या प्रवासी फ्रेंच साहित्य’ क्यों नहीं कहते ?

5. क्या प्रवासियों की हिंदी भाषा (बोली, ध्वनि एवं उच्चारण आदि / लिपि नहीं), कालांतर में, इतना बदल जाती है कि इसे कोई नए नाम की आवश्यकता पड़ सकती है और पड़ी है ?


इन मुख्य बिन्दुओं पर चर्चा प्रारम्भ करने से पहले यह आवश्यक है कि जिस सृजनता की भूमि पर विचार किया जा रहा है उसको सही ढंग से परिभाषित कर समझ लिया जाय। भाषा-लिपि-वाङ्मय के अंतःसम्बंधों को समझते हुए उनमें जो सूक्ष्म भेद है उसको भी समझा जाय ताकि जब हम हिंदी कहते हैं तो सब एक ही बात समझें न कि कोई भाषा या कोई साहित्य। साहित्य का बीज कब और कैसे विचार के रूप में जन्म लेता है जो भाषा-लिपि के माध्यम से सामने आता है, इसको वैज्ञानिक आधार पर समझने का प्रयास किया जाना चाहिए ।


आधुनिक समाज के जनजीवन में संतुलन एवं स्थिरप्रज्ञता बनाए रखने में स्थानीय भाषा का बहुत बड़ा किंतु सीमित योगदान है । उपयुक्त भाषा-लिपि द्वैत के संभोग से ( "जीवन जगत के सम्भोग, अनुभूति  और सोच के गर्भ में ....... समाहित होता है"   लक्ष्मीमल सिंघवी, पुनश्च, 2007, पृष्ठ 31, प्रभात प्रकाशन ) विचारों को स्थायित्व प्रदान कर विभिन्न प्रकार के साहित्य का सृजन किया जाता है, जो चक्षुप्रिय होते हुए देश-काल की सीमा को लाँघने की क्षमता रखता है । वाङ्मय की अभिव्यक्ति के लिए क्रमानुसार तीन अवयवों की आवश्यकता होती है । सबसे पहले उन विचारों का प्रस्फुटन जिनको स्थायित्व प्रदान करना है । साहित्य को ठीक से निरखने-परखने के लिए यह आवश्यक है कि हम इसके मूल में जाएँ अन्यथा भटक-भटक कर लहरों की तरह किनारों से टकरा कर चूर-चूर होते ही रहेंगे । चेतना-विचार और साहित्य एक दूसरे के अभिन्न अंग हैं । चेतना की अनुपस्थिति में विवेक का अस्तित्व समाप्त हो जाता है तथा चिंतन के बिना सही-गलत का निर्णय ही नहीं हो पाता । विचारों की उत्पत्ति चेतना-चिंतन के मिश्रण से होती है । और इसके उपरांत भाषा-लिपि (अक्षर, वर्ण, आकृति) के रूप में इसकी अभिव्यक्ति होती है । लिपि को भाषा (ध्वनि) का प्रतिरूप होना ही चाहिए-अर्थात जो जैसे कहा जाए वैसे ही लिखा भी जाए । उदाहरण के लिए फोटो खींचने की प्रक्रिया को ही ले लीजिए । यदि फोटो विषय वस्तु के अनुरूप नहीं होती है तो पहचानने में परेशानी आती है । उसी प्रकार लिपि के साथ भी होता है, यदि जो कहा या लिखा गया है दोनों में एकरूपता नहीं होती है । यह तब होता है जब लिपि ध्वन्यात्मक नहीं होती है । यह लिपि की वैज्ञानिकता का परिचायक होता है । भाषा-लिपि के संदर्भ में यह समझना नितांत आवश्यक है कि इन दोनों से अधिक महत्वपूर्ण है विचार, विचारों की संरचना और फिर उसकी अभिव्यक्ति ध्वनि-अक्षर के माध्यम से कैसे होती है ? क्या विचारों के अवयव डिजिटल कंप्यूटर की ईकाई (0,1) की तरह मस्तिष्क में आते हैं ? या फिर स्कैनिंग प्रक्रिया की तरह समूचा विचार एक फोटो की तरह । यह समझ लेने के बाद ही मस्तिष्क के उत्पाद को ठीक से समझा जा सकता है । न्यूरो लिंग्विस्टिक प्रोग्रामिंग (एन.एल.पी.) ने सम्भवतः यह विषय अभी तक नहीं छुआ है । इसके अध्ययन से यह स्थापित किया जा सकेगा, ऐसी सोच है, कि विचारों की अभिव्यक्ति मातृभाषा में ही प्रभावशाली एवं उत्कृष्ट हो सकती है । एन.एल.पी. की अन्य स्थापित परियोजनाओं की तरह इसमें भी पुराने अनुभवों एवं संस्कारगत इकाइयों आदि का प्रयोग करना ही पड़ेगा । जब तक यह वैज्ञानिक ढंग से सिद्ध नहीं हो जाता हम यह मान कर चलते हैं, जैसा कि भाषाविदों ने प्रतिपादित कर रखा है, कि मातृभाषा के प्रयोग से ही राष्ट्रीय रचनात्मक उत्पाद में उत्कृष्टता आ सकती है और यह प्रगति की ओर तीव्र गति से बढ़ सकता है । उदाहरण के लिए छोटे से राष्ट्र इज़राइल को ले लें जहाँ आद्योपांत  शिक्षा का माध्यम देश की मातृभाषा हिब्रू है और राष्ट्र के सारे कामकाज हिब्रू में होते हैं । द्रष्टव्य परिणाम यह है कि देश के जन्म से अब तक इसकी झोली में कम-से-कम 12 नोबल पुरस्कार पड़ चुके हैं और भारत जैसे महाराष्ट्र की क्या स्थिति हैं हम सब जानते हैं । अस्तु अन्य भाषाओं के माध्यम से केवल काम-चलाऊ वाङ्मय की रचना ही संभव हो सकती है जो किसी राष्ट्र की वास्तविक धरोहर बनने में अक्षम ही रहेगा।


वास्तव में परेशानी ‘‘प्रवासी’’ शब्द के रूढ़ बन गए अर्थ में है । इस विषय पर मैंने 2005 में अपनी कलम चलाई और साहित्य अकादमी के मुख्य सभागार में 12 जनवरी 2005 को आवाज उठाई थी । निश्चय ही पहली पीढ़ी के प्रवासियों द्वारा मुम्बई, दिल्ली, कोलकाता या बंगलौर में रचित साहित्य, प्रवासी शब्द के व्यापक अर्थ के अनुसार (घर से बाहर जाने वाला), प्रवासी साहित्य कहलाएगा । रूढ़ हो गए अर्थ के अनुसार ऐसे लोगों को ‘स्वदेशी प्रवासी’ कह सकते हैं और विदेशों में बसे भारतीयों को ‘विदेशी प्रवासी’ कह सकते हैं । यह केवल एक विनम्र सुझाव है अगर इससे कुछ आसानी होती है प्रवासी शब्द के व्यापक अर्थ समझने में । और इस प्रकार विदेशी प्रवासियों के हिंदी साहित्य को ‘विदेशी प्रवासी हिंदी साहित्य’ कहेंगे अगर उनमें निम्नलिखित गुणों में से कोई एक भी पाया जाय । ठीक उसी प्रकार जैसे श्रीराम जी ने शबरी को नौ प्रकार की भक्तियों का उपदेश दिया और कहा कि इनमें से एक भी रखने वाला मेरा भक्त कहलाएगा ।


विदेशी प्रवासी हिंदी साहित्य के लक्षण

1. अचल सम्पति के मालिक दीर्घकालिक प्रवासी हिंदी रचनाकार की रचनाएँ जो विदेशों में कम से कम 10 वर्षों से रह रहे हों । साहित्य को विभिन्न देशों के परिप्रेक्ष्य में देखना चाहिए ।
2. स्थानीय संस्कृति-संस्कारों की झलक ।
3. स्थानीय रीति-रिवाज़ों की झलक ।
4. स्थानीय परिवेश एवं वातावरण का चित्रण/उल्लेख ।
5. स्थानीय भाषा, मुहावरों एवं प्रतीकों का प्रयोग ।
6. स्थानीय खान-पान एवं रहन-सहन का चित्रण ।
7. स्थानीय सामाजिक मूल्यों एवं रिश्तों के समीकरणों की प्रस्तुति ।
8. स्थानीय साहित्यकारों एवं साहित्य का उल्लेख ।
9. देश-विदेश के जीवन-मानव मूल्यों का चित्रण ।
10. परिवार, परिजन, परजन, प्रियजन, देश बिछोह पीड़ा का चित्रण ।
11. देश-विदेश परिवेश जनित भिन्नताओं का चित्रण ।
12. देश-विदेश मान्यताओं के टकराव का चित्रण ।


इस आलेख का मुख्य उद्देश्य है कि प्रवासी हिंदी साहित्य को लेकर जो मतभेद एक बुलबुले की तरह कुछ समय से उठता रहा है उसको शांत करना । साक्ष्य, तथ्य एवं जगह-जगह के उदाहरणों का सहारा लेकर आलेख का ताना-बाना बुना गया है । भावभूमि को तैयार करने के लिए विषय वस्तु से जुड़े प्रसंगों के बारे में भी संक्षेप में वार्ता की गई है । जिन पाँच बिन्दुओं पर हम अपने आपको केन्द्रित करेंगे उनकी शुरुआत जूलाई 2011 में ‘ई-कविता’ मकड़जाल से प्रारम्भ हो कर ‘हिंदी भारत’ के माध्यम से आगे बढ़ी थी । इसमें विश्व के कई विचारकों के अवदानों की आहुति पड़ी और लगभग सबकी बातें पहले बिन्दु पर ही आधारित थीं  कि व्यक्ति प्रवासी होता है उसकी भाषा नहीं अतः क्या प्रवासी रचनाकारों की कृतियों को ‘प्रवासी हिंदी साहित्य’ के रूप में स्वीकार करना चाहिए ?


सबसे अहम् प्रश्न है कि क्या प्रवासी की भाषा कालांतार में देशांतर से बदल सकती है ? अगर हाँ तो क्या इसको कोई नाम देना न्याय संगत होगा ? हम देख चुके हैं कि किस प्रकार एक व्यक्ति प्रवासी बनता है । यह बात और है कि हमें उन लोगों को किस वर्ग में रखना चाहिए जो अपने ही देश में प्रवासी हैं । दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस विषय पर अब तक कोई चर्चा खुलकर नहीं हुई है । जैसे गोरखपुर से विस्थापित व्यक्ति का मायानगरी कोलकाता या मुम्बई में बस जाना । इस आलेख में इस ओर इशारा किया गया है । सुधीजनों का काम है उस पर विचार कर आगे बढ़ना । प्रवासियों के वर्गीकरण पर डॅा. प्रेम प्रकाश पाण्डेय (3) का शोधपरक आलेख अवलोकनीय है । इस बात का स्पष्टीकरण प्रारम्भ में ही हो जाना चाहिए कि जब हम भाषा (हिंदी) की बात करते हैं, कहते या लिखते हैं, तो हमारा इशारा साहित्य के किस अवयव की ओर होता है - उच्चरित ध्वनि, लिपि या फिर इनके द्वारा विरचित साहित्य । एक बात तो स्पष्ट है कि हिंदी कहीं और कभी लिखी जाए उसकी लिपि देवनागरी ही होगी तथा साहित्य की ओर संकेत ऐसी स्थिति में नहीं हो सकता क्योंकि यह अलग से बात उठाई गई है । अतः चर्चा का विषय जो बचा वह रहा कि क्या प्रवासियों की उच्चरित ध्वनि इतनी बदल जाती है कि उसे प्रवासी हिंदी कहा जाय या कोई अन्य नाम दिया जाय ताकि सबको समझने में सुविधा रहे । हर प्रवासी को अपनाए गए परिवेश के अनुरूप खान-पान, पहनावा एवं बात करने के ढंग में परिवर्तन लाना पड़ता है । जैसे देहात से शहर में आए व्यक्ति का धोती-कुर्ता छोड़ कर पैंट-कमीज का अपनाना और कुछ स्थानीय शब्दों का प्रयोग भी । यही हाल सात समुन्दर पार पहुँचे प्रवासियों के साथ होता है । लिबास के साथ ही उनका उच्चारण बदल जाता है, अस्तु भाषा । अमेरिका, कैनाडा, आस्ट्रेलिया आदि देशों में बसे भारतीयों के उच्चारण इस बात की पुष्टि करते हैं । ऐसा हो जाना या करना उनकी आवश्यकता बन जाती है । अतः भाषा बदलती है । इसका प्रभाव ऐसे लोगों के साहित्य पर नहीं पड़ेगा ऐसा सोचना ही गलत होगा । यह पहचान संकट (आइडेंटिटी क्राइसिस) का मुद्दा बन जाता है । 


अब मैं अपनी बात को भाषाविज्ञान के उस व्यवहारिक अनुभवसिद्ध सिद्धांत से शुरू करता हूँ जो भौतिक दूरी, पानी एवं बोली के बीच एक समीकरण स्थापित करता है -

तीन कोस पर बदलै पानी
आठ कोस पर बदलै बानी

आंचलिक भाषा में दूरी को कोस में मापते हैं (एक कोस लगभग 3 किलो मीटर के बराबर होता है) । भारत में इसके प्रभाव को देखा जा सकता है यहाँ तक कि इसी कारण मुम्बई में बसे लोगों की हिंदी को ‘मुम्बइया हिंदी’ कहते हैं । फीजी की हिंदी को ‘फीजियन हिंदी’, सूरिनाम की हिंदी को ‘सरनामी हिंदी’ आदि-आदि कहते हैं । भारत से बाहर बसे प्रवासियों की बदली हिंदी भाषा को यदि कोई सामूहिक नाम देने की आवश्यकता पड़ती है तो वह केवल ‘प्रवासी हिंदी’ ही हो सकता है । विभिन्न देशों में प्रवासियों की बदली हुई भाषा के अनेकानेक उदाहरण अन्यत्र आलेखों में मिलते हैं । सुनने में अजीब लग सकता है किंतु सत्य से भाग भी तो नहीं सकते हैं । ऐसे रचनाकारों की कृतियों को सामूहिक पहचान, यदि देनी है तो इसको ‘प्रवासी हिंदी साहित्य’ ही कहा जाएगा । व्यक्तिगत रूप में भिन्नता आ सकती है और इसके कई उदाहरण दिए जा सकते हैं जिनके नामांकन  की कोई आवश्यकता नहीं प्रतीत होती ।


इस विषय से दूर जाने से पहले भाषाविज्ञान के व्यवहारिक सिद्धांत को प्रतिपादित करते हुए जॅार्ज बर्नार्ड शाह के नाटक ‘पिगमैलियन’ का उल्लेख समीचीन होगा । 1912 के इस नाटक में यह दिखाया गया है कि बोली (भाषा) एक गली से दूसरी गली में बदल जाती है और इसमें परिवर्तन लाया जा सकता है । भारत से आए कर्नल पिकरिंग एवं स्वर वैज्ञानिक प्रो.हेनरी हिगिंस ने यह स्थापित कर एक साधारण फूल बेचने वाली लड़की को वार्यल परिवार के समकक्ष खड़ा कर दिया । इस नाटक का फिल्म रूपांतर ‘माई फेयर लेडी’ के नाम से बहुत चर्चित रहा है ।

अब हम दूसरे मुख्य बिन्दु को अपनी चर्चा का विषय बनाते हैं कि -
क्या प्रवासी हिंदी साहित्य को केवल हिंदी का साहित्य कह कर हिंदी के महासागर में ही रखना चाहिए ? क्या इसको हिंदी का होते हुए एक अलग पहचान देने या मिलने की आवश्यकता नहीं है ?


जिस प्रकार एक नदी सागर में समाते ही अपनी पहचान खो देती है, सम्भवतः वही होगा प्रवासी रचनाओं के साथ । ऐसी कृतियाँ अभी चीत्कार कर रही हैं कि मुझे भी देखो, पढ़ो और परखो । ध्यान रहे कि किसी चीज की पहचान बनने में समय एवं अथक परिश्रम दोनों लगता है । साहित्य के संदर्भ में दो ऐसे सामाजिक विषयों को ही ले लें जिनके बारे में, कुछ समय पहले, लोग नहीं जानते थे । वे हैं दलित एवं महिला वर्ग के लोग । जबसे दलित एवं महिला विमर्श पर खुल कर बातें अलग से शुरू हुई हैं । इनके बारे में लोग जागरूक हुए हैं । अनेकानेक सम्मेलनों के आयोजन हुए हैं, विशेषांक निकले और जनमानस की सोच बदली है । महिला रचनाकारों ने मुखर हो कर अपनी बातें स्पष्ट रूप से कही हैं जिससे साहित्य-समाज का एक नया चेहरा सामने आया है । अविश्वसनीय बातें प्रकाश में आई हैं और लोगों के ज्ञान का आकाश विस्तृत हुआ है । प्रवासी हिंदी साहित्य को अपनी विशिष्ट पहचान के लिए एक भिन्न नाम की क्यों आवश्यकता है । भारतीय फलों के राजा आम के उदाहरण के माध्यम से समझने का प्रयास करते हैं । विश्व के विभिन्न कोनों में (प्रवासी रचनाकारों की तरह) तरह-तरह के आम पाए जाते हैं जिनका सामूहिक नाम आम ही है किंतु उनको ठीक से पहचानने के लिए सबके अलग-अलग नाम हैं जैसे चौसा, दशहरी, सफ़ेदा और लंगड़ा आदि । इसी प्रकार नागरी लिपि में प्रस्तुत हिंदी भाषा समूह के अन्तर्गत भोजपुरी, ब्रज, अवधी, दलित विमर्श, महिला विमर्श एवं प्रवासी हिंदी साहित्य आदि हैं । मेरी समझ में नहीं आता कि कुछ लोगों को इसमें परेशानी क्या हैं ? सोच की पराकाष्ठा का अंदाजा इससे लगाया जा सकता हैं कि माननीय डॅा.रूप सिंह चंदेल को प्रवासी शब्द में गुलामी की बू आती है । उन्ही के शब्दों में ‘‘साहित्य के साथ प्रवासी शब्द का प्रयोग मुझे गुलामी का अहसास करवाता है"   (हिंदी भारत, 5 जूलाई 2011)।’’


किसी भी सामान्य व्यक्ति की समझ से यह परे होगा कि किसी की पहचान को जताने वाले नाम से या किसी के नाम से ‘गुलामी’ का अहसास कैसे हो सकता है । शारीरिक गुलामी तो थोपी जा सकती है किंतु मानसिक तो हम स्वेच्छा से अपनाते हैं जैसे भारतीय भाषाओं का तिरस्कार कर अंग्रेजी भाषा का अपनाना । आज अबाध गति से लोग अनावश्यक अंग्रेजी के शब्दों को हिंदी में डाल कर इसे प्रदूषित कर रहे हैं । ऐसे लोगों को ऐसा करने में दासता की बू नहीं आती । यह कैसी विडम्बना है । प्रवासी रचनाकारों की कृतियों के सामूहिक नाम ‘प्रवासी हिंदी साहित्य’ से क्यों और कैसे दासता की बू आती है ? विश्व हिंदी साहित्य समाज को चाहिए कि इसे सहर्ष स्वीकार कर कदम से कदम मिला कर हिंदी के कल्याण के लिए, इसे वह वैश्विक स्वरूप प्रदान कराएँ जिसकी यह अधिकारिणी है । जैसा कि डॉ.कमल किशोर गोयनका जी (4) ने कहा है- ‘‘अतः हिंदी के प्रवासी साहित्य की गति और विकास को अब कोई भी विरोधी शक्ति नहीं रोक सकती । वह हिंदी साहित्य की एक सशक्त धारा बन चुकी है और उसे हमें हिंदी साहित्य की प्रमुख धारा में सम्मानपूर्ण स्थान देना होगा ।’’ अब चाहे जितने राजेन्द्र यादव सरीखे इसका गला घोटने की कोशिश करें यह जाने वाला नहीं । कालांतर में जब कभी विश्व हिंदी साहित्य का वृहत्त इतिहास डॅा. नगेन्द्र या आचार्य श्रीराम चन्द्र शुक्ल की तरह लिखा जाएगा, जो कि शीघ्र ही होगा, तब रचयिता से यह नहीं हो पाएगा वह प्रवासी हिंदी साहित्य को नकार दे । इसमें अपना उपयुक्त स्थान बनाते हुए कुछ प्रवासी रचनाकारों एवं उनकी रचनाओं का भी उल्लेख होगा ।


अब आइए उस निरर्थक प्रश्न या बिन्दु की ओर आते हैं जिसको कुछ प्रवासी रचनाकारों ने उठा कर या अपनी चिंता व्यक्त कर, भारत के आलोचकों को उकसाया है कि वे बेमतलब प्रवासी रचनाओं में दोष निकाल कर उसकी भर्त्सना करते हुए उसे दोयम दर्जे का करार दें । इसका सम्बंध उस विषय से है जिसको किसी ने सही ढंग से परिभाषित तक नहीं किया है - हिंदी की मुख्यधारा क्या है ?

क्या प्रवासी रचनाकार हिंदी की तथाकथित ‘मुख्यधारा’ से चिपक कर रहना चाहता है ? अगर हाँ तो क्यों ?


जबसे भागीरथ ने गंगा धरती पर उतारी है तबसे इसका रुख निरंतर बदलता रहा है, धारा बदलती रही है । उसी प्रकार हिंदी साहित्य के साथ भी हुआ है । किसी समय इलाहाबाद को हिन्दी की मुख्य धारा का केन्द्र माना जाता था जो बाद में वारानसी हुआ और अब यह दिल्ली हो गया है । हमारे प्रवासी रचनाकार बन्धु किस धारा से जुड़ने की बात करते हैं-सम्भवतः दिल्ली की धारा से । लेकिन यह हाय-तौबा क्यों ? समय सब स्वतः निर्धारित कर देता है । हमारे आपके या किसी के तमाम शोर करने से कुछ नहीं हेागा । वास्तविकता तो यह है कि हर कलाकार यह चाहता है कि उसकी कलाकृति को देखा, सुना, पढ़ा, सराहा और परखा जाए । इसके लिए यह आवश्यक है कि कला के प्रशंसक उपलब्ध हों । जहाँ तक हिंदी की बात है भारत में ही ऐसे लोग प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं । भारत में ही हिंदी की गति विधियों को विस्तार देने की सारी सुविधाएँ एवं संसाधन भी हैं । पत्र-पत्रिकाएँ, सम्पादक, आलोचक एवं प्रकाशक हैं । प्रो. कृष्ण दत्त पालीवाल सरीखे आलोचक भी हैं जिनकी समीक्षाओं को हिंदी जगत सम्मान सहित गम्भीरता पूर्वक स्वीकार करता हैं क्योंकि वह बाजारवाद के दबावों से, जहाँ तक मैं जानता हूँ, न झुकते हैं न समझौता ही करते हैं । किंतु इसमें अपवादों की कमी भी नहीं है, जिनकी ओर संकेत किया जा चुका है । और इस कारण हिंदी साहित्य में गलत सोच और कृतित्व वाले रचनाकार स्थापित हो जाते हैं तथा अच्छे साहित्यकार चाहे वे निवासी हों अथवा प्रवासी गिरा भी दिए जाते हैं । किसी पंथ विशेष की सदस्यता, जैसे कि वामपंथ, का होना या न होना भी साहित्य जगत को बदनाम कर रहा है । ऐसे कृत्य दुखद एवं निंदनीय होते हुए साहित्य जगत के साथ विश्वासघात करते हैं । वास्तव में हर जगह बाजारवाद की घुसपैठ हो चुकी है ।


हिंदी साहित्य में दशकों से स्थापित साहित्यकारों की कतार में खड़ा होना ही, कुछ प्रवासी रचनाकार, मुख्य धारा से जुड़ना समझ रहे हैं । इसमें कोई बुराई नहीं । किंतु अच्छा साहित्य सृजन तपस्या एवं त्याग माँगता है । तपस्या में एक लम्बा समय लगता है । मेरा विनम्र निवेदन अपने प्रवासी रचनाकार बन्धुओं एवं बान्धवियों से है कि अभी वे अपनी रचनाओं को गुणवत्ता के आधार पर भारत की पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होने दें, वहाँ की गतिविधियों (गोष्ठियों आदि में) अपनी उपस्थिति दर्ज कराएँ तथा सौम्यता पूर्वक अपने विचार व्यक्त करें । समय सुनेगा, साहित्य सुनेगा । पहचान बनेगी । और जैसा संकेत किया गया है कि प्रवासी रचनाओं का पठन-पाठन भारत के हिंदी जगत में होगा । धैर्य वह कुंजी है जिससे अनेकानेक परेशानियों के ताले खुलते हैं ।


आइए अब उस प्रश्न की ओर बढ़ें कि हिंदी में ही क्यों प्रवासी साहित्य, विदेशों में अन्य भाषाओं में विरचित सात्यि को इस नाम से क्यों सम्बोधित नहीं किया गया ? मुख्य बिन्दु हैः

हिंदी के अलावा अन्य भाषाओं में भी रचनाकारों ने प्रवास में रचनाधर्मिता को कायम रखा है तो फिर उनके साहित्य को ‘प्रवासी अंग्रेजी या प्रवासी फ्रेंच साहित्य’ क्यों नहीं कहते ?

सतही तौर पर देखने से लगता है कि हिंदी साहित्य क्यों ऐसा अजूबा बन गया है ? अंग्रेज और फ्रेंच विद्वानों ने भी अपने देश से बाहर प्रवास काल में आवश्यकतानुसार साहित्य सृजन किया है । दोनों में सबसे बड़ा अंतर है संख्या का, समूह बनने का । बिना समूह बने, सामूहिक नाम की संकल्पना नहीं की जा सकती । प्रवासी रचनाकारों की संख्या बड़ी होने के कारण ही ऐसे साहित्य को ‘प्रवासी हिंदी साहित्य’ के नाम से पुकारा गया है ।


आइए अब पुनः उस बिन्दु की ओर ध्यान दें जिसका सम्बंध भाषा के बदलते हुए स्वरूप से है । इस संदर्भ में हम पहले भी देख चुके हैं कि भाषा बदलती है और यह विश्व की सभी भाषाओं के साथ हेाता है ।‘पिजिन भाषा’ का जन्म इसका प्रमाण है ।

क्या प्रवासियों की हिंदी भाषा (बोली, ध्वनि एवं उच्चारण आदि लिपि नहीं), कालांतर में, इतना बदल जाती है कि इसे कोई नए नाम की आवश्यकता पड़ सकती है और पड़ी है ?

विश्व के विभिन्न कोनों में अंग्रेजी का स्वरूप बदला है और इसके के आधार पर ‘भारतीय अंग्रेजी’, ‘अमेरिकन अंग्रेजी’, ‘ऑस्ट्रेलियन अंग्रेजी’ आदि का नामांकन हुआ । यही हाल फ्रेंच या इटालियन भाषा के साथ भी हुआ है जो स्वाभाविक भी है । जैसा कि पहले भी लिखा गया है कि किस प्रकार विभिन्न देशों में हिंदी का स्वरूप बदला है । इन देशों से जन्मे साहित्य को परखने के लिए भाषायी-शिल्प सम्बंधी मापदंडों को भिन्न रूप में देखना होगा । इन्हें यदि द्विकेन्द्रीय लेंस के माध्यम से देखा जाय तो सम्भवतः तो हो सकता है भाषा-भाव-संवेदनाओं के साथ सही न्याय हो सके । ध्यान रहे मैं किसी रियायत की वकालत नहीं कर रहा वरन् केवल दृष्टि बदलने की ओर संकेत कर रहा हूँ । मेरे विचार से प्रवासियों की हिंदी को कोई नया नाम देने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि यह भाव ‘प्रवासी हिंदी साहित्य’ में सही तरह से प्रतिलक्षित हो जाता है ।


इस आलेख में यह दिखाने का प्रयास किया गया है कि क्यों प्रवासी रचनाओं को एक भिन्न वर्ग ‘प्रवासी हिंदी साहित्य’ में रखना ही समीचीन एवं न्यायिक होगा । यह समय की आवश्यकता के अनुरूप भी है । आधुनिक विश्व हिंदी जगत के वरिष्ठतम साहित्यकार डॅा. रामदरश मिश्र की दृष्टि व्यापक एवं सूक्ष्म रही है । साहित्य की लगभग सभी विधाओं पर उन्होंने प्रचुर मात्रा में लिखा है । प्रवासी रचना संसार एवं प्रवासी साहित्य को भी उन्होंने बारीकी से देखा-परखा है । जनवरी 2006 में अक्षरम संगोष्ठी द्वारा आयोजित एक त्रिदिवसीय सम्मेलन के अकादमिक सत्र के उद्घाटन में अध्यक्ष के रूप में उन्होंने जो कहा वह महत्वपूर्ण तो है ही साथ-साथ में प्रवासी हिंदी साहित्य के विरोधियों को कुछ सोचने की चुनौती भी देता है । उन्होंने कहा था-‘‘प्रवासी साहित्य ने हिंदी को नई जमीन दी है और हमारे साहित्य का दायरा दलित विमर्श और स्त्री विमर्श की तरह विस्तृत किया है (5) ।’’



सन्दर्भ:

1. डॉ. कृष्ण कुमार, “प्रवासी हिंदी लेखन की पृष्ठिभूमि और उसका स्वरूप”, वर्तमान साहित्य का प्रवासी महा विशेषांक, जनवरी-फरवरी 2006, पृष्ठ 68-72 ।

2. डॉ. कृष्ण कुमार, “प्रवास एवं प्रवासी साहित्य , नया ज्ञानोदय, दिसम्बर 2008 अंक, पृष्ठ 12-14 ।

3. डॅा. प्रेम प्रकाश पाण्डेय, “प्रवास प्रक्रियाः संबोध, पीड़ा एवं प्रतिफल”, प्रवासी संसार, जुलाई-सितम्बर 2006, वर्ष 3, अंक 3, पृष्ठ 15-18 ।

4. डॉ.कमल किशोर गोयनका, ‘भूमिका शब्दयोग, अप्रैल 2008’, पृष्ठ 6-8 ।

5. अक्षरम संगोष्ठी, अप्रैल-जून 2006, पृष्ठ 67 ।


पुनश्च  
संदर्भ सूची में दिए लेख किसी भी पाठक की माँग पर यहाँ उपलब्ध करवाए जा सकते हैं। 

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Monday, 29 October 2012

मुश्किल है बहुत मुश्किल...'अमेरिका से चिट्ठी'

अमेरिका से चिट्ठी

 मुश्किल है बहुत मुश्किल...। 
उमेश अग्निहोत्री 


अमेरिका में 13 किस्म के स्पोर्ट्स ड्रिंक हैं, 85 किस्म के जूस हैं, 75 तरह की आइस्ड-टी है, 95 किस्म के कलेवे हैं । दर्द के लिये अस्सी किस्म की दवाएँ है । सुपर मार्किट में लगभग 30 हज़ार चीज़ें उपलब्ध होती हैं, हर साल इनमें 20 उत्पाद और आ जुड़ते हैं । 45 किस्म के स्टीरिओ सिस्टम, 50 किस्म के स्पीकर, उतनी ही तरह के डीवीडी प्लेअर, 85 किस्म के टेलीफोन, अनेकों तरह के मोबाइल फोन और बीस तरह के वीडिओ कैमरे हैं । वस्त्रों की विविधता का अंत नहीं है । कॉलेजों में पाठ्यक्रमों की बात करें तो हारवर्ड में कुल 220 पाठ्यक्रम हैं, साहित्य और कला के 58, ऑनर्स के 40 कोर्स हैं । प्रिंसटन में 350 पाठ्यक्रम हैं, स्टैनफर्ड विश्वविद्यालय में भी उतने ही । पेनसिलवेनिया में एक छात्र को 40 ऑनर्स पाठ्यक्रमों में से अपनी पसंद का पाठ्यक्रम चुन सकता है। यही हाल टीवी पर केबल चैनलों का है । और यह सूची लम्बी से लम्बी की जा सकती है । 


Mitt Romney and President Obama shake hands at the University of Denver on October 3.यह ब्योरा इसलिये दिया कि मन में सवाल पैदा हुआ कि जिस देश में आदमी को अपनी पसंद की चीज़ चुनने के लिए इतने विकल्प सुलभ किये गये हों, वहाँ राष्ट्रपति चुनाव के मामले में केवल दो ही ........ ? एक रिपब्लिकन, दूसरा डैमोक्रेट । जो खुलापन अन्य क्षेत्रों में है, वह राजनीति में नज़्रर क्यों नहीं आता ? उसमें इतनी अनुदारता, इतनी कृपणता ? 


अमेरिका में दो-पार्टी प्रणाली है । बताया जाता है इसके उभरने के ऐतिहासिक कारण हैं, जनसंख्या अधिकतर या तो रिपब्लिकन है तया डैमोक्रेट, शासकीय पदों पर या तो रिपब्लिकन हैं या डैमोक्रेट, हर विषय के दो नज़रिये होते हैं, संघ और राज्य सरकारों के कानून दो पार्टी प्रणाली को ही सुदृढ़ करते हैं । यह सब क्यों है इसका कोई संतोषजनक उत्तर आज तक नहीं मिला । 


हाँ, जहाँ तक अनेकों उत्पादों में में से एक या अधिक को छाँटने का मामला है या राष्ट्रपति पद के लिये दो में से को किसी एक को चुनने का, यह दोनों ही स्थितियाँ अमरिकियों को एक जैसी ही उलझन में डाल रही हैं । सुपरबाज़ारों के श्लफों पर उत्पादों की विविधता इतनी हो गयी है, कि कई खरीदार किंकर्तव्यविमूढ़-से घंटों चीजों के डिब्बों को उलट-पलट कर उन की इबारत का अध्ययन करते रहते हैं, और अंत में –बाज़ार से गुज़रा हूं खरीदार नहीं हूं – के अंदाज़ में खाली हाथ घर लौट जाते हैं । राजनीति में भी यह ही प्रवृति देखने में आ रही है । रिपब्लिकन और डैमोक्रेट उम्मीदवार इतनी मिलती-जुलती बातें करने लगते हैं, कि कई मतदाताओं को उनमें कोई अंतर ही नज़र नहीं आता । मतदान के लिये वे घरों से ही नहीं निकलते । 


मतदाताओं की दुविधा को कोका कोला और पैप्सी कोला के बीच देखने में आयी प्रतिस्पर्धा के संदर्भ में भी समझा जा सकता है । कहते हैं रिपब्लिकन कोका कोला प्रेमी हैं, और डैमोक्रेट पैप्सी कोला प्रेमी । कोका कोला और पैप्सी कोला के बीच ‘स्वाद के परीक्षणों’ में अक्सर पैप्सी बाज़ी मारता आ रहा था । पैप्सी कोला को जीतते देख कोका कोला ने कोशिश की कि उसके पेय का स्वाद भी पैप्सी जैसा बने । उसने यह किया, तिस पर भी बात नहीं बनी । तब किसी ने सुझाया कि कोका कोला को अपना पुराना फार्मूला नहीं छोड़ना चाहिये । कोका कोला ने वही किया और ‘क्लासिक कोला’ निकाला, और पैप्सी को हराया । 


Opt begin( कहते हैं कि राष्ट्रपति रॉनल्ड रेगन और बाद के नेताओं की जीत के पीछे यह भी एक कारण था कि उन्होंने रिपब्लिकन पार्टी की विचारधारा का रूढ़िवादी फार्मूला अपनाया था । राष्ट्रपति क्लिंटन थे तो डैमोक्रेट लेकिन कई मामलों में राष्ट्रपति रेगन के प्रशंसक थे । (end opt) इस बार मिट रौमनी और बराक ओबामा के मुकाबले में कोक और पैप्सी की प्रतिस्पर्धा जैसी स्थिति ही देखने में आ रही है । दोनों के बीच हुए पहले डिबेट-मुकाबले में रौमनी अपनी तर्ज़ बदलने लगे, और अपने तर्कों में ओबामा के वक्तव्यों को इस हद तक पिरोने लगे कि ओबामा लगातार हैरान-परेशान नज़र आये । वह बार-बार कहते - गवर्नर रौमनी अब तक आप अपने चुनाव अभियान के दौरान कुछ और ही कहते रहे हैं । 


हाँ, रौमनी ने ‘क्लासिक कोला’ की तर्ज पर रिपब्लिकन पार्टी की रुढ़िवादी सोच के नये पैरोकार पॉल रायन को अपने साथ जोड़ा है । 


यह भी है कि सुपर बाज़ारों के शेल्फ चाहे जितनी भी तरह की वस्तुओं से अटे पड़े हों, कुछ चीजों को खरीदे बगैर उपभोक्ता का गुज़ारा नहीं है । ऐसे में बहुत से खरीदार बहुत माथापच्ची नहीं करते और उसी ब्रांड की चीज़ें खरीद लेते हैं, जो वे खरीदते रहे होते हैं, भले ही घर आकर पता चले कि उत्पाद के अवयव बदल चुके हैं । इसी तरह बहुत से मतदाता उसी पार्टी के उम्मीदवार को वोट देने का फैसला कर लेते हैं, जिसकी विचारधारा की परम्परा उन्हें लुभाती रही है । डिबेट मुकाबले हों न हों, उनमें चाहे कोई जीते, वे अपनी पार्टी के उम्मीदवार को ही वोट डालते हैं, भले ही चुनाव आज होना है या 6 नवम्बर को । 


राजधानी सहित अमेरिका के पैंतीस राज्यों में ( early voting ) निर्धारित दिन से पहले मतदान की पद्धति अपनाई जा चुकी है । 17 अक्तूबर से मतदान शुरू हो चुका है । राष्ट्रपति ओबामा और उनकी पत्नी वोट डाल चुके हैं । जॉर्ज टाउन विश्वविद्यालयके प्रोफैसर मैक्डॉलल्ड के अनुसार 35 प्रतिशत मतदान 6 नवम्बर से पहले ही हो चुका होगा । और कई राजनीतिक टीकाकार तो यह तक कह रहे हैं कि इस बार का चुनाव परिणाम चुनाव से पहले ही तय हो जायेगा । 


सचमुच असमंजस में हैं वे लोग, जिन्हें एक उम्मीदवार का कुल पैकेज तो आकर्षक/अनाकर्षक लगता है, लेकिन पैकेज के भीतर के कुछ आइटम घोर पसंद/नापसंद होते हैं । सब ठीक-ठाक लगे, तो पैकेज की पेशकश और मार्कइटिंग उनके दिलों को नहीं ठुकती । फिर यह भी है कि जो जितेगा उसे चार साल तक बरदाश्त भी करना होगा । मुश्किल है बहुत मुश्किल ।


Friday, 14 September 2012

हिन्‍दी और प्रवासी भारतीय

 आज हिन्दी दिवस पर विशेष 
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    राकेश बी. दुबे
पूर्व सांस्‍कृतिक अताशे,
भारतीय उच्‍चायोग, लन्‍दन

 
हिन्‍दी साहित्‍य की एक अनुषंगी इकाई के रूप में भारत से बाहर रचे जा रहे हिन्‍दी साहित्‍य की चर्चा इधर पिछले एक दशक से विभिन्‍न मंचों पर होने लगी है । यद्यपि, साहित्‍यकारों और आलोचकों के बीच इस बात पर मतभेद है कि प्रवासी हिन्‍दी साहित्‍य की संज्ञा, अनिवासी भारतीयों एवं भारतवंशियों द्वारा रचे गए साहित्‍य को देना उपयुक्‍त है भी या नहीं । मतभेद तो इस बात को लेकर भी हैं कि किसी भाषाविशेष में साहित्‍य को इस प्रकार निवासी एवं प्रवासी साहित्‍यकारों के खाँचों में बाँटना क्‍या अभीष्‍ट है भी । यद्यपि हमारा अभिप्राय इस विषय पर बहस में उलझने का नहीं है और मोटे तौर पर यह मानते हुए कि दीर्घ अवधि से भारत से बाहर रह रहे भारतवंशियों द्वारा जो रचनाएँ, प्रवासकाल में की जा रही हैं या की गई हैं उनका मूल्‍यांकन एवं परिगणन करने में सुविधा के लिए, इन रचनाकारों को प्रवासी हिन्‍दी रचनाकार और उनकी रचनाओं को प्रवासी हिन्‍दी साहित्‍य की श्रेणी में रखा जा सकता है; तथापि, इस मुद्दे पर विद्वत्जनों में चर्चा तो होनी ही चाहिए ।


पौराणिक गाथाओं के अनुसार सृष्टि के आदि पुरुष महाराज मनु पहले प्रवासी कहे जा सकते हैं । प्रलय के समय उन्हें जम्बू द्वीप छोड़कर आधुनिक मिस्र में जाकर रहना पड़ा था । लिखित इतिहास में सम्राट अशोक के पुत्र एवं पुत्री भी बौद्ध धर्म का प्रचार करने के लिए श्रीलंका, हिन्द चीन और चीन के प्रवास पर गए थे । ग्यारहवीं शताब्दी में मलय द्वीप पर एवं हिन्द चीन के देशों आधुनिक कम्बोडिया, इण्डोनेशिया आदि पर अपनी विजय पताका फहराने गए राजराजा चोल एवं राजेन्द्र चोल के साथ गए सैनिकों में से कुछ वहीं बस गए और उनकी संततियों के साथ वर्तमान आन्ध्र प्रदेश एवं तमिलनाडु के संबंध/सम्पर्क आज तक विद्यमान हैं । परन्तु इस लेख में सुदूर अतीत के प्रवासियों की नहीं अपितु निकट अतीत में अर्थात् पिछले दो सौ वर्षों में देश से गए भारतीयों और उनकी सन्तति द्वारा की गई हिन्दी रचनाओं को शामिल किया जाना अभिप्रेत है ।


यह भी विचारणीय है कि ‘प्रवासी भारतीय’ पद को परिभाषित किए बिना प्रवासी हिन्‍दी साहित्‍य पर चर्चा करना सुकर कैसे होगा । प्रवासी है कौन ? कितनी अवधि तक प्रवास करने पर किसी व्‍यक्‍ति को प्रवासी की श्रेणी में रखा जाएगा ? पहले पहल उन्‍नीसवीं सदी में अर्थात् 1834 में मॉरीशस में उतरे पहले प्रवासी भारतीय से लेकर बीसवीं शताब्‍दी में 1920-21 तक शर्तबन्‍दी प्रथा के अंतर्गत अर्थात् गिरमिटिया मजदूरों के रूप में मॉरीशस, त्रिनिदाद, दक्षिण अफ्रीका, गयाना, फिजी, सूरीनाम आदि में गए भारतीय भी प्रवासी कहे जाते हैं और वर्तमान में रोजगार, शिक्षा एवं प्रव्रजन पर जाने वाले भारतीय भी प्रवासी कहे जा रहे हैं । लगभग 177 वर्ष पहले से लेकर लगभग 90 वर्ष पूर्व तक भारत से गए लोगों की तीसरी नहीं तो चौथी पीढ़ी उन देशों में रह रही है, उनका जन्‍म, पालन पोषण, शिक्षा-दीक्षा वहीं हुई है; ऐसे में क्‍या उन्‍हें भी प्रवासी माना जाए ? इसके विपरीत आधुनिक यूरोप, दक्षिण पूर्व एशिया और अमेरिका में पिछले 50 वर्ष के दौरान रोजगार, पढ़ाई, व्‍यापार आदि के लिए गए प्रवासियों को भी क्‍या उसी श्रेणी में रखा जाना उचित होगा ? जैसा कि ऊपर बताया गया है कि इस प्रकार के प्रश्‍न लगातार उठते रहे हैं और कोई सर्वमान्‍य समाधान इस बारे में नहीं निकला है । हमें कहीं न कहीं, कोई एक आधार तो तय करना ही होगा इसलिए मेरी अल्‍पबुद्धि के अनुसार, इन सभी के भारत से जुड़ाव को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि प्रवासी भारतीयों की हमारी संकल्‍पना उन भारतवंशि‍यों की है जो कि‍न्‍हीं कारणों से वि‍देश में कुछ काल के लि‍ए या फि‍र सदैव के लि‍ए बस तो गए हैं लेकि‍न उनका भारत से सम्‍पर्क समाप्‍त नहीं हुआ है


इसमें कोई सन्‍देह नहीं कि कुछ सीमा तक भारत में और बड़ी हद तक भारत से बाहर, हिन्‍दी शिक्षण के लिए विदेशी विद्वानों ने जो कार्य किया है, वह भारतीय मनीषियों द्वारा की गई हिन्‍दी सेवा से किसी भी प्रकार कम नहीं है। कुछ मामलों में तो वह बढ़कर ही है । लेकिन इस लेख का ध्‍येय, विदेशी विद्वानों के योगदान से हटकर उन प्रवासियों/भारतवंशियों के योगदान को रेखांकित करने का है जो या तो भारत में जन्‍मे और बाद में प्रवास पर गए या फिर जिनका जन्‍म ही भारत से बाहर हुआ है। लेख के प्रारंभ में ही, विषय की सुविधा के लिए इन सबको एक ही श्रेणी में रखने का औचित्‍य दिया गया है । यद्यपि प्रवासी शब्‍द को अन्‍यथा परिभाषित करने के लिए पाठकगण स्‍वतंत्र हैं ।


मॉरीशस, गयाना, ट्रिनिडाड एवं टुबैगो, सूरीनाम या डच गयाना और फिजी में गए श्रमिकों की अलग पहचान है । इन देशों में गए श्रमिक अधिकांशत: हिन्दी भाषी क्षेत्र अर्थात् पूर्वी उत्तर प्रदेश एवं बिहार से गए थे और उनकी मातृभाषा भोजपुरी एवं अवधी थी । मलेशिया, थाईलैण्ड, म्यांमार, रीयूनियन द्वीप, तंजानिया, उगांडा, जिम्बाम्बे, दक्षिण अफ्रीका और जमैका आदि देशों में भारतीय नागरिक, व्यापारी के रूप में गए लेकिन इनमें जाने वाले अधिकांश भारतीय हिन्दीतर प्रदेश के थे और इस लेख में उनकी चर्चा हमारा अभीष्ट नहीं है । फिर भी, इन देशों में जो हिन्दी साहित्यकार रचनारत हैं या रहे हैं, उनका उल्लेख संक्षेप में यथा स्थान किया जाएगा । यूरोपीय देशों में, साठ एवं सत्तर के दशकों में गए भारतीयों और अमेरिका गए डॉक्टरों, इंजीनियरों, वैज्ञानिकों आदि में से कई विद्वान हिन्दी के उल्लेखनीय रचनाकार बने । इसलिए उनका उल्लेख यूरोप एवं अमेरिका के प्रवासी हिन्दी साहित्यकारों के अंतर्गत किया जाएगा । तीसरी धारा जो अपेक्षाकृत परवर्ती और निकट अतीत की है, वह है: खाड़ी के देशों में गए कुशल/अकुशल श्रमिकों/तकनीशियनों की ।


इस प्रकार भारत से बाहर हिन्‍दी लेखन को उक्‍त धाराओं के अनुसार मोटे तौर पर तीन समूहों में रखा जा सकता है: पुरा-प्रवास के देश, नव-प्रवास के देश और भारत के पड़ोसी देश । खाड़ी के देशों को भी भारत के पड़ोसी देशों की श्रेणी में इसलिए रखा जा रहा है कि इन देशों में हिन्‍दी लेखन की चुनौतियाँ और अवसर, भारत के पड़ोसी देशों - श्रीलंका, पाकिस्‍तान, बंगलादेश, नेपाल, भूटान, म्‍यांमार आदि के लगभग समान ही हैं ।






पुरा प्रवास के देश


मॉरीशस
इसमें कोई अतिशयोक्‍ति नहीं कि भारत से बाहर हो रहे हिन्‍दी लेखन में मॉरीशस का स्‍थान सबसे आगे है । वर्ष 1834 से लेकर अब तक यह कार्य किसी न किसी रूप में अविकल जारी है और इसकी गुणात्‍मकता में ह्रास के स्‍थान पर वृद्धि ही हुई है । परिमाण की दृष्‍टि से देखें तो इस छोटे से देश में रचे गए हिन्‍दी साहित्‍य को अमेरिका में प्रवासी भारतीयों की विपुल संख्‍या और उस देश के विशाल भू-भाग में बसे रचनाकारों के समग्र साहित्‍य से टक्‍कर लेते देखा जा सकता है । लिखित इतिहास के अनुसार अमेरिकी हिन्‍दी साहित्‍य की तुलना में यहाँ का साहित्‍य बहुविध भी है ।


मॉरीशस में पं. बासदेव बिसुनदयाल से लेकर श्री हेमराज सुन्‍दर जैसे आधुनिक साहित्‍यकारों की एक लम्‍बी परम्‍परा रही है । इस विस्‍तृत आकाश में शुक्र तारे की तरह दैदीप्‍यमान अभिमन्‍यु अनत जैसे प्रतापी रचनाकार जहाँ  बहुश्रुत हैं, वहीं ब्रजेन्‍द्र भगत मधुकर, डॉ मुनीश्‍वरलाल चिंतामणि, रामदेव धुरंधर, इन्‍द्रनाथ भोला बेणीमाधव रामखिलावन, महेश रामजियावन, प्रहलाद रामशरण, के. हजारीसिंह , डॉ बीरसेन जागासिंह और राजेन्‍द्र अरुण जैसे सितारे चमकते दिखाई देते हैं । मॉरीशस की पहली प्रकाशित रचना है पंडित लक्ष्‍मीनारायण चतुर्वेदी रसपुंज की ‘रसपुंज कुंडलियाँ’ जो वर्ष 1923 में प्रकाशित हुई थी । चतुर्वेदी जी की ही दूसरी कृति शताब्‍दी सरोज के नाम से वर्ष 1934 में आई । इस प्रकार पंडित लक्ष्‍मी नारायण चतुर्वेदी को मॉरीशस का आदि कवि कहा जा सकता है ।


मॉरीशस में भारतीयों का इतिहास खून को पसीना बनाने का इतिहास रहा है । कठिन जलवायु और बीमारियों से भरे इस अनजान टापू पर हिन्‍दी लेखन की शुरुआत तो उस पत्‍थर पर ही हो गई बताते हैं जहाँ गोरों से छिपकर प्रवासी मजदूर, पानी से लिखा करते थे । मॉरीशस की पहली पाठशालाएँ, उन बैठकाओं को माना जा सकता है जो रात के अंधेरे में प्रवासी मजदूरों के गुप्‍त मिलन के साक्षी बने और जहाँ अंधेरे में हनुमान चालीसा और रामायण के स्‍फुट अंशों का पाठ ही ईश्‍वर से सीधा संपर्क साधने का साधन बन गया था । महात्‍मा गांधी जी की प्रेरणा से पंडित बासदेव बिसुनदयाल ने हिन्‍दी और भारतीय संस्‍कृति को अपने स्‍वाधीनता आंदोलन के मूल में रखा और आजादी पाई । क्‍या यह कथा भारत की आजादी के आंदोलन में हिन्‍दी की प्रतिष्‍ठा से मिलती जुलती नहीं दिखाई देती ?  लेकिन भारत में हिन्‍दी को जिस प्रकार का राजनैतिक समर्थन आज की स्‍थिति में प्राप्‍त है उसे देखते हुए मेरा मानना तो यह है कि हिन्‍दी की स्‍थिति मॉरीशस में भारत से भी अधिक प्रतिष्‍ठित दिखाई देती है । केवल इसलिए नहीं कि उस छोटे से देश में दो-दो विश्‍व हिन्‍दी सम्‍मेलन हुए, इसलिए नहीं कि हिन्‍दी को विश्‍वभाषा बनाने का सपना पूरा करने के लिए विश्‍व हिन्‍दी सचिवालय की स्‍थापना वहाँ हुई, इसलिए भी नहीं कि हिन्‍दी में लगभग 400 ग्रन्‍थों/रचनाओं का प्रकाशन अकेले मॉरीशस से हो चुका है अपितु इसलिए कि मॉरीशस ही ऐसा देश है जहाँ के राष्‍ट्रपिता सर शिवसागर रामगुलाम से लेकर राष्ट्रपति सर अनिरुद्ध जगन्‍नाथ तक बड़े गर्व से हिन्‍दी बोलते हैं ।


मॉरीशस में न केवल सैकड़ों काव्‍य और कहानी संकलनों का प्रकाशन हुआ है बल्‍कि वह एक समृद्ध उपन्‍यास विधा पर भी गर्व कर सकता है । लगभग हर विधा में रचनाएँ मॉरीशस में हुई हैं । काव्‍य संग्रहों और कहानी संकलनों के अलावा 56 उपन्‍यास, 26 नाटक/एकांकी, 3 अनूदित नाटक, 13 निबंध संग्रह, 12 जीवनियाँ, 4 व्‍यंग्‍य संग्रह, 3 यात्रावृत्‍त, 2 बाल रचनाएँ, 8 संस्‍मरण, लोक साहित्‍य की 4 रचनाएँ, इतिहास पर 7 रचनाएँ, धर्म, दर्शन और संस्‍कृति पर 19 रचनाएँ, साहित्‍य के इतिहास पर 6 रचनाएँ, 4 शोधकार्य और 13 विविध रचनाएँ मॉरीशस में प्रकाशित हुई हैं ।


फीजी
पूर्वी उत्‍तर प्रदेश और बिहार से आरकाटियों (रिक्रूटरर्स) के जाल में फंसकर जब भोले भाले भारतीय वर्ष, 1879 में पहली बार ‘लेवनीदास’ जहाज से गिरमिटिया (एग्रीमेंट का अपभ्रंश रूप) मजदूर बनकर फीजी पहुँचे होंगे तो अपना देश छूटने से ज्‍यादा चिन्‍ता उन्‍हें नए देश में बसने की रही होगी । लेकिन सब कुछ छोड़-छाड़कर भारत से एक अनजान द्वीप की यात्रा पर निकले इन मजदूरों के साथ उनकी संस्‍कृति और संस्‍कृति वाहिनी भाषा, मृग की कुण्‍डली में बसी कस्‍तूरी के समान साथ थी। वे जा तो रहे थे ब्रिटिश साम्राज्‍य के एक अनजाने क्षितिज की ओर लेकिन उनकी महारानी उनके साथ थी । हाँ, हाँ उनकी अपनी महारानी जिसे वे रामायण महारानी कहते थे। अपने 132 वर्ष के प्रवास में फीजी के भारतवंशी, अलग अलग अधिपतियों/राष्‍ट्रपतियों के अधीन काम करते हुए भी अपनी महारानी को ही सर्वोच्‍च स्‍थान देते रहे । उनके अपने बीच ही नहीं बल्‍कि काईबीती (फीजी के मूल निवासी) लोगों के साथ संपर्क की भाषा भी धीरे-धीरे हिन्‍दी ही बन गई । कहते हैं कि – "स्‍वधर्मे निधनम् श्रेय: परधर्मे भयावह:" । स्‍वधर्म (स्‍व-संस्‍कृति) को न त्‍यागने वाले फीजी गिरमिटिया मजदूरों में हिन्‍दी शिक्षण का व्‍यवस्‍थित कार्य शुरू किया- आर्य प्रतिनिधि सभा ने । बाद में श्री सनातन धर्म महासभा ने भी इस काम को आगे बढ़ाया । श्री दिवाकर प्रसाद और श्री भास्‍कर मिश्र जैसे पत्रकारों ने फीजी रेडियो में हिन्‍दी को प्रतिष्‍ठित किया । डॉ. मणिलाल को भारतीय प्रवासियों का दीनबन्‍धु कहना अनुचित न होगा । उन्‍होंने न केवल मॉरीशस में बल्‍कि फीजी में भी पद-दलित प्रवासी भारतीयों को मान और प्रतिष्‍ठा दिलाने के लिए संघर्ष किया । गिरमिटिया मजदूरों को संगठित करने के लिए उनके द्वारा अंग्रेजी में पहला समाचार पत्र प्रकाशित हुआ- `द सेटलर' के नाम से वर्ष 1913 में । बाद में पंडित शिवराम शर्मा के संपादन में इसी का हिन्‍दी संस्‍करण निकलने लगा । इसे फीजी में हिन्दी का पहला समाचार पत्र कहा जाता है । बाद में फीजी समाचार (बाबू राम सिंह के संपादन में), वैदिक संदेश, शान्‍तिदूत आदि का प्रकाशन होने लगा । पाक्षिक समाचार पत्र शान्‍तिदूत को विदेश में हिन्‍दी पत्रकारिता का सशक्‍त हस्‍ताक्षर माना जाता है और यह अब तक प्रकाशित हो रहा है ।


हिन्‍दी बाल पोथी (कुल छ भागों में) में से पाँच भागों के लेखक पंडित अमीचन्‍द शर्मा को पहला हिन्‍दी लेखक कहा जा सकता है । हिन्‍दी बाल पोथी का प्रकाशन यद्यपि बाद में हुआ और उससे पहले पंडित रामचन्‍द्र शर्मा की पुस्‍तक फीजी दिग्‍दर्शन वर्ष 1936 में प्रकाशित हो चुकी थी । प्रकाशन की कठिनाइयों के कारण फीजी के हिन्‍दी रचनाकारों की पुस्‍तकें कम प्रकाशित हो पाई हैं, फिर भी पंडित कमला प्रसाद मिश्र, महावीर मित्र, काशीराम कुमुद, ज्ञानी दास, जोगिन्‍द्र सिंह कंवल, अनुभवानंद आनंद जैसे कवि और महेन्‍द्र चन्‍द्र शर्मा, प्रो. सुब्रमणी, गुरुदयाल शर्मा, भारत बी मौरिस जैसे गद्य लेखक फीजी में हिन्‍दी के प्रमुख हस्‍ताक्षर हैं । प्रो सुरेश ऋतुपर्ण ने पंडित कमला प्रसाद मिश्र की काव्‍य साधना के प्रकाशन के माध्‍यम से पंडित मिश्र की प्रतिभा को विश्‍व के सामने रखा । श्री विवेकानन्‍द शर्मा ने फीजी में हिन्दी को न केवल लेखक के रूप में बल्‍कि राजनेता के रूप में भी प्रतिष्‍ठित किया । उनकी कलम कई विधाओं में सक्रिय रही। प्रशान्‍त की लहरें नामक कहानी संग्रह से लेकर सरल हिन्‍दी व्‍याकरण तक और फीजी के प्रधानमंत्री से लेकर फीजी में सनातन धर्म-सौ साल की रचना करके वे फीजी हिन्‍दी साहित्‍य को समृद्ध कर गए हैं ।



सूरीनाम, गयाना, त्रिनीदाद

5 जून, 1873 को लालारुख ने जब सूरीनाम के तट पर लंगर डाला और गिरमिटिया मजदूरों के पहले जत्‍थे के चरण जब इस धरती पर पड़े तो सच मानिए कि हिन्‍दी ने पूर्वी गोलार्द्ध से पश्‍चिमी गोलार्द्ध की अपनी विश्‍वयात्रा का एक और पड़ाव पार कर दिया था । कुल लगभग 65 जहाजों में धीरे-धीरे करके 34,304 हिन्‍दुस्‍तानी इस देश में आए । आप जानते ही होंगे कि 1975 में नीदरलैण्‍ड से आजादी मिलने के बाद और प्रवासी भारतीयों की एक बड़ी आबादी के नीदरलैण्‍ड में जाकर बस जाने के बावजूद सूरीनाम में लगभग 40 प्रतिशत आबादी भारतवंशियों की है । कुल लगभग 36 वर्ष के आजाद सूरीनाम में लगभग 134 मंदिर व धार्मिक केन्‍द्र हैं, जो न केवल धार्मिक-सामाजिक आयोजनों के साक्षी रहते हैं बल्‍कि भाषायी जरुरतों की पूर्ति का एक बड़ा साधन भी हैं । जिस प्रकार से पं अमीचंद शर्मा ने हिन्‍दी शिक्षण के लिए बाल पोथी, फीजी में लिखी थी उसी प्रकार से सूरीनाम में व्‍यवस्‍थित हिन्‍दी शिक्षण की शुरुआत का श्रेय बाबू महातम सिंह को दिया जाना चाहिए । आज पचास से अधिक स्‍वयंसेवी हिन्‍दी शिक्षक, बाबू महातम सिंह के काम को आगे बढ़ाते हुए लगभग 600 विद्यार्थियों को हिन्‍दी की शिक्षा दे रहे हैं ।


मुंशी रहमान खान को सूरीनाम का आदि हिन्‍दी कवि कहा जाता है । उनकी रहमान दोहा शिक्षावली और पंडित रामलाल शर्मा की वेद वन्‍दना के रूप में हिन्‍दी काव्‍य का जो निर्झर उन्‍नीसवीं शताब्‍दी में शुरु हुआ था वह आज पंडित लक्ष्‍मी प्रसाद बलदेव (बग्‍गा), श्री मंगल प्रसाद, बाबू चंद्रमोहन, रणजीत सिंह, महादेव खुखुन, अमर सिंह रमण, डॉ जीत नराइन, सुरजन परोही, पंडित हरिदेव सहतू, रामनारायण झाव, रामदेव रघुवीर, जनसुरजनराइन सिंह सुभाग, प्रेमानन्‍द भोंदू के रूप में आगे बढ़कर छोटी नदी का रूप लेने लगा है । इस कार्य में अपनी तरह से सुशीला बलदेव मल्‍हू, संध्‍या भग्‍गू, तेजप्रसाद खेदू, सुशील सुक्‍खू, देवानंद शिवराज, धीरज कंधई और रामदेव महाबीर भी योगदान करते रहे हैं । इस कार्य में नए हस्‍ताक्षर भी शामिल हैं जैसे कि अमित अयोध्‍या, वीना अयोध्‍या, विकास समोधी, डॉ कारमेन जगलाल, कृष्‍णा कुमारी भिखारी, संध्‍या लल्‍कू, तारावती बद्री, लीलावती कल्‍लू और सुमित्रादेवी बलदेव । यहाँ  की सक्रिय पत्रिकाएँ  ही इन लेखकों की रचनाओं के प्रकाशन का साधन हैं और इनमें सूरीनाम साहित्‍य मित्र संस्‍था के तत्‍वावधान में प्रो पुष्‍पिता अवस्‍थी द्वारा स्‍थापित पत्रिका शब्‍द शक्‍ति, सूरीनाम हिन्‍दी परिषद् की सूरीनाम दर्पण और हिन्‍दी नामा, आर्य दिवाकर की धर्म प्रकाश और वैदिक संदेश, बाबू महातम सिंह की शान्‍ति दूत प्रमुख हैं । हाल ही में हिन्‍दी एवं संस्‍कृति अताशे सुश्री भावना सक्‍सेना के संपादन में एक कविता संग्रह एक बाग के फूल का प्रकाशन हुआ है । यद्यपि प्रो पुष्‍पिता के संपादन में सूरीनाम की अन्‍य भाषाओं की रचनाएँ, हिन्‍दी में कथा सूरीनाम और कविता सूरीनाम के शीर्षक से वर्ष 2003 में प्रकाशित हो चुकी हैं । हिन्‍दी की प्राध्‍यापिका डॉ एन. कान्‍ता रानी के संपादन में और भारतीय दूतावास के सहयोग से मंजूषा हिन्‍दी पाठमाला हाल ही में 3 खंडों में प्रकाशित हुई है ।


दक्षिण अमेरिका में अवस्‍थित तीन पड़ोसी देश गयाना के नाम से जाने जाते हैं- डच गयाना अर्थात् सूरीनाम, ब्रिटिश गयाना अर्थात् गयाना और फ्रेंच गयाना । हमारा तात्‍पर्य यहाँ केवल ब्रिटिश गयाना से है । सूरीनाम की तरह ही ब्रिटिश गयाना में हिन्‍दुस्‍तानी मजदूर शर्तबन्‍दी प्रथा के अंतर्गत गए थे । पहला जहाज व्हिटवी, 13 जनवरी, 1838 को 249 श्रमिकों के साथ कोलकाता से रवाना हुआ था । 16 दिन बाद 165 श्रमिकों को लेकर चला हेसपरस भी व्‍हिटवी के साथ ही 5 मई 1838 को डेमरारा में गयाना के तट पर पहुँचे । यद्यपि महात्‍मा गांधी और दीनबंधु सीएफ एंड्रूज के प्रयत्‍नों से गयाना में हिन्‍दी शिक्षा की व्‍यवस्‍था, गयाना के आजाद होने से पहले ही हो गई थी लेकिन गयाना में हिन्‍दी की स्‍थिति सूरीनाम जैसी नहीं है । बाबू महातम सिंह के सद्प्रयासों से गयाना में हिन्‍दी का शिक्षण तो शुरु हुआ और श्रीमती रत्‍नमयी दीक्षित एवं श्री योगीराज जी ने इस कार्य को जी-जान से आगे बढ़ाया लेकिन प्रकाशन संस्‍थानों एवं खरीदारों के अभाव में कोई उल्‍लेखनीय पुस्‍तक यहाँ प्रकाशित न हो पाई । गयाना की स्‍वयंसेवी संस्‍थाओं के अलावा, भारतीय उच्‍चायोग, गयाना विश्‍वविद्यालय और भारतीय सांस्‍कृतिक केन्‍द्र में भी हिन्‍दी शिक्षण समय समय पर होता रहा है। गयाना हिन्‍दी प्रचार सभा, गयाना हिन्‍दू धार्मिक सभा, महात्‍मा गांधी संगठन, आदि जैसी संस्‍थाओं ने इस कार्य को आगे बढ़ाया है ।


त्रिनिदाद एवं टोबैगो की स्‍थिति भी लगभग गयाना जैसी ही है । लगभग 158 साल पहले से लेकर अब तक इस देश में हिन्‍दी भाषियों ने हिन्‍दी के प्रति अपना प्रेम तो प्रदर्शित किया है लेकिन पश्‍चिमी प्रभाव में यहाँ  इन भारतवंशियों की भाषा भी क्रियोल हो गई है । स्‍पेनी क्रियोल, फ्रेंच क्रियोल ने हिन्‍दी के कुछ शब्‍दों को अपनाया अवश्‍य है, लेकिन मूल भाषा यहाँ गुम होने लगी है । हिन्‍दी को अब 70 वर्ष से अधिक आयु के लोगों में बोले जाते देखा जाता है । त्रिनिदाद में हिन्‍दी शिक्षण के प्रकल्‍प के साथ-साथ चनका सीताराम की हिन्‍दी निधि, रवि महाराज का हिन्‍दू प्रचार केन्‍द्र और प्रोफेसर एवं महाकवि/संगीतज्ञ हरिशंकर आदेश का भारतीय विद्या संस्‍थान, हिन्‍दी भाषा, भारतीय संगीत और लोकगीतों एवं लोककलाओं को संजोने/बढ़ाने का काम कर रहे हैं लेकिन साहित्‍य सृजन जैसी कोई स्‍थिति वहाँ नहीं बन पाई है । प्रो हरि शंकर आदेश भी अब कनाडा में रह रहे हैं, नहीं तो उन्‍होंने अकेले ही शताधिक पुस्‍तकें हिन्‍दी भाषा में लिखी हैं । यों तो सनातन धर्म महासभा, आर्य प्रतिनिधि सभा, हिन्‍दू सेवा संघ की ओर से भी हिन्‍दी के पठन पाठन की व्‍यवस्‍थाएँ होती रही हैं और भारतीय दूतावास एवं वैस्‍टइंडीज विश्‍वविद्यालय भी हिन्‍दी शिक्षण के लिए कटिबद्ध हैं लेकिन त्रिनिदाद रेडियो ने अवश्‍य ही हिन्‍दी शिक्षण के लिए समय समय पर ठोस पहल की हैं । स्‍थानीय एफ एम रेडियो 91.1 पर राजिन महाराज, 90.5 पर हाइदी रामभरोसे, रणधीर महाराज जैसे लोगों ने समय समय पर रेडियो पर हिन्‍दी सिखाने के कार्यक्रम तैयार किए और प्रसारित किए । प्रो वी आर जगन्‍नाथन के कार्यकाल में हिन्‍दी शिक्षण को अवश्‍य ही एक नई दिशा मिली ।


दक्षिण अफ्रीका
महात्‍मा गांधी की कर्मभूमि दक्षिण अफ्रीका में हिन्‍दी की स्‍थिति पर बहुत चर्चा भारत में नहीं हुई है। मेरा मानना है कि दक्षिण अफ्रीका, भविष्‍य में गयाना और त्रिनिदाद की अपेक्षा हिन्‍दी भाषा का एक महत्‍वपूर्ण स्‍थान बनकर उभरेगा । हमें यह भी ध्‍यान में रखना होगा कि व्‍यापारिक उद्देश्‍य के लिए हजारों गुजराती उद्यमी अफ्रीका गए और भारत से बाहर व्‍यापार के माध्‍यम से अपनी जड़ें जमाने वालों में गुजराती भारतीयों का अग्रणी स्थान है । शर्तबन्‍दी प्रथा के अंतर्गत भी मॉरीशस, फीजी, गयाना, सूरीनाम, त्रिनिदाद के अलावा दक्षिण अफ्रीका में भारतीय मजदूर गए थे । वे वर्ष 1860 में वहाँ पहुँचने लगे थे । प्रारंभ में तो अन्‍य साम्राज्‍यवादी ताकतों की भांति ही दक्षिण अफ्रीका के शासक गोरों ने हिन्‍दी या अन्‍य भारतीय भाषाओं की पढ़ाई की कोई व्‍यवस्‍था नहीं की और हिन्‍दी का पठन पाठन निजी प्रयत्‍नों तक सीमित रहा लेकिन बाद में भारतवंशियों की प्रगति के लिए बड़े प्रयत्‍नों से वर्ष 1927 में केपटाउन एग्रीमेंट पर हस्‍ताक्षर किए गए यद्यपि हिन्‍दी शिक्षण की बात तब भी लागू नहीं हो पाई ।


जिस प्रकार से गयाना और सूरीनाम में बाबू महातम सिंह ने हिन्‍दी शिक्षण को व्यवस्‍थित किया और फीजी में पंडित अमीचंद शर्मा ने, उसी प्रकार से वर्ष 1947 में भारत से गए पंडित नरदेव वेदालंकार ने राष्‍ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा में अपने हिन्‍दी शिक्षण के अनुभव को वहाँ लागू किया और हिन्‍दी पाठ्यक्रम में व्‍यवस्‍था एवं शैक्षिक मूल्‍यों की स्‍थापना की । अफ्रीका में प्रवासी भारतीयों की हिन्‍दी की पढ़ाई के लिए और उन्‍हें भारतीयता से जोड़े रखने के लिए एक अन्‍य विभूति को भी हमें नहीं भूलना चाहिए, वे हैं स्‍वामी भवानीदयाल सन्‍यासी । हिन्‍दी की शिक्षा के मामले में एक नया मोड़ तब आया जब 1961 में डरबन वेस्‍टविल विश्‍वविद्यालय में बी ए से लेकर पीएच.डी तक हिन्‍दी पढ़ाई जाने लगी । काशी हिन्‍दू विश्‍वविद्यालय से शिक्षा प्राप्‍त करके प्रो रामभजन सीताराम ने यहाँ हिन्‍दी की पढ़ाई को उच्‍च स्‍तर का बनाया । हालांकि 1977 में सरकारी स्‍कूलों में हिन्‍दी का प्रवेश हो गया लेकिन व्‍यावसायिक कारणों से और देशीय भाषाओं को बढ़ावा देने की नीति लागू होने से अब वहाँ सरकारी तौर पर हिन्‍दी को समर्थन मिलना बहुत कठिन है लेकिन प्रौद्योगिकी ने उम्‍मीद बंधाई है और हिन्‍दी अब फिर से भारतवंशियों की जुबान पर आने लगी है । हिन्‍दी शिक्षा संघ ने दक्षिण अफ्रीका में हिन्‍दी के लिए जो कार्य किया है उसकी बराबरी विश्‍व में कुछ गिनी-चुनी हिन्‍दी संस्‍थाएँ ही कर सकती हैं । हिन्‍दी शिक्षा संघ की स्‍थापना 25 अप्रैल, 1948 को हुई और तुरंत ही 35 नई पाठशालाओं ने इसके अधीन हिन्‍दी सिखाना शुरू कर दिया । एक कदम आगे बढ़ते हुए हिन्‍दी शिक्षा संघ ने वर्ष 1998 में हिन्‍दवाणी के नाम से अपना रेडियो स्‍टेशन शुरू किया । विश्‍व में कार्यरत किसी भी हिन्‍दी सेवी संस्‍था का संभवत: यह पहला रेडियो स्‍टेशन है । इस रेडियो को अब डरबन के अलावा पीटरमेरित्‍जबर्ग सहित अनेक छोटे छोटे नगरों में भी सुना जाता है । भारतीय दूरदर्शन चैनलों के विश्‍वव्‍यापी प्रसारण ने भारतीय संस्‍कृति, वेश भूषा, खान-पान आदि के बारे में नई समझ पैदा की है । भारत के साथ अफ्रीका के बढ़ रहे आर्थिक-राजनैतिक संबंधों को देखते हुए अफ्रीका में हिन्‍दी का भविष्‍य उज्‍ज्‍वल दिखाई देता है । ाभा


नव प्रवास के देश

अमेरिका
जिस प्रकार से पुरा प्रवास के देशों में अधिकांश भारतीय, शर्तबन्‍दी प्रथा के अन्‍तर्गत मजदूरों के रूप में गए थे और उन्‍होंने जी तोड़ मेहनत करके न केवल अपने लिए मान-सम्‍मान अर्जित किया बल्‍कि आने वाली पीढि़यों को भी एक ठोस आधार प्रदान किया, उसी प्रकार से नव प्रवास भी कहीं न कहीं शर्तों से जुड़ा रहा है । विश्‍व के नव धनाढ्य देश यह तो चाहते रहे कि मेहनत मजदूरी के लिए उन्‍हें दुनियाभर से लोग मिल जाएँ लेकिन उनके कल्याण के लिए किसी ने भी नहीं सोचा । यही नहीं, उनके जीवन को नियंत्रित किया गया, उनकी परम्‍पराओं, लोक-रीतियों, वेश-भूषा को हीन भावना से देखा गया और जब चाहा तब उनके आगमन पर भी प्रतिबंध लगाए गए । अमेरिकी महाद्वीप में भारतीयों का प्रवेश, किसी भी प्रकार से निर्बाध और सुगम नहीं रहा । कनाडा में उतरे जहाज कोमागाटामारू की कहानी से कौन परिचित नहीं है । यह उस समय की रंगभेदी और नस्‍लभेदी नीतियों का ज्‍वलंत उदाहरण है । फिर भी, उन्‍नीसवीं शताब्‍दी में जो कुछ लोग अमेरिका, कनाडा में पहुँचे, उन्‍होंने स्‍वयं को स्‍थापित कर लिया और वहीं से उनकी समृद्धि की तथा संभावित अवसरों की कहानियां पंजाब के गाँव गाँव पहुँचने लगीं । वर्ष 1910 तक लगभग 10 हजार भारतीय अमेरिका/कनाडा में पहुँच चुके थे जिनमें लगभग 90 प्रतिशत पंजाबी मूल थे । लेकिन भारतीयों के अमेरिका प्रवेश पर प्रतिबंध कई प्रकार से बने रहे । 1950 और 1960 के दशक में प्रतिवर्ष केवल सौ भारतीय ही कानूनन अमेरिका में आ सकते थे ।


द्वितीय विश्‍व युद्ध के जो भी परिणाम रहे हों, लेकिन इस युद्ध ने अमेरिका की आँखें खोल दीं और अमेरिका से बाहर की दुनिया को जानने की आवश्‍यकता उसे महसूस हुई । यह आवश्‍यकता, विश्‍व के अन्‍य देशों की संस्‍कृति या भाषाओं को जानने समझने की उतनी नहीं थी जितनी कि अपनी आर्थिक एवं प्रतिरक्षा आवश्‍यकताओं से संचालित एक जरूरत, गंभीरता से महसूस करने की थी । यही कारण है कि आज भी अमेरिका में विदेशी भाषाओं का अध्‍ययन इन्‍हीं दो कसौटियों के अनुसार घटता बढ़ता रहता है और इन्‍हीं दोनों आवश्‍यकताओं के वशीभूत भारतीयों के आगमन पर प्रतिबंधों में ढील/छूट दी गई और नई नई श्रेणियों में भारतीयों को वहाँ आकर पढ़ने, काम करने और बसने के लिए आमंत्रित भी किया गया । आज विश्‍वभर में सबसे अधिक प्रवासी भारतीय अमेरिका/कनाडा में ही हैं । उनकी संख्‍या 25 लाख से भी अधिक है । इनमें पूर्वी अफ्रीका के देशों से वहाँ की राष्‍ट्रवादी सरकारों द्वारा 1960 के दशक में खदेड़े गए गुजराती व्‍यापारी भी हैं जिन्‍होंने अपनी व्‍यावसायिक बुद्धि का लोहा तंजानिया, केन्‍या, उगांडा के अलावा अमेरिका में भी मनवा लिया ।


अमेरिका की इन्‍हीं जरूरतों ने और 11 सितम्‍बर, 2001 की भयावह घटनाओं की पृष्‍ठभूमि में उसे एशियाई भाषाओं की ओर विशेष ध्‍यान देने के लिए प्रेरित किया । अमेरिकी राष्‍ट्रपति जार्ज डब्‍ल्‍यू बुश ने एक कदम आगे बढ़ते हुए जनवरी 2006 में अरबी, उर्दू, पश्‍तो आदि भाषाओं के साथ हिन्‍दी को विशेष प्रोत्‍साहन देने की घोषणा की । अमेरिका में यद्यपि हिन्‍दी एवं अन्‍य भारतीय भाषाओं का आधार तैयार करने का काम लाला हरदयाल जी ने वर्ष 1913 में ही कर दिया था, लेकिन अपनी भाषा सहित अन्‍य सामाजिक-सांस्‍कृतिक अधिकार, प्रवासी भारतीयों को, संविधान सम्‍मत रूप में मिलने का काम शुरू हुआ वर्ष 1946 से । वर्ष 1947 में यूनिवर्सिटी ऑव पेन्‍सिलवेनिया में दक्षिण एशियाई विभाग खोला गया जिसमें हिन्‍दी की पढ़ाई की भी व्‍यवस्‍था थी इसमें पादरी नारमन ब्राउन का योगदान भुलाया नहीं जा सकता । उन्‍नीसवीं शताब्‍दी के छठे दशक में प्रमुख विश्‍वविद्यालयों- शिकागो, मैडिसन, पेन, कोलंबिया, बर्कले आदि में, आठवें दशक में कुछ अन्‍य विश्‍वविद्यालयों के साथ प्रतिरक्षा संस्‍थान में और नवें दशक से लेकर इक्‍कीसवीं शताब्‍दी के पहले दशक तक 100 से अधिक विश्‍वविद्यालयों/उच्‍च शिक्षा संस्‍थानों और भाषा संस्‍थानों में हिन्‍दी की पढ़ाई की व्‍यवस्‍था हो गई । स्‍वैच्‍छिक संस्‍थाओं जैसे कि हिन्‍दी यूएसए के बैनर तले संडे स्‍कूलों में भी हिन्‍दी की पढ़ाई आज अमेरिका में हो रही है ।


स्‍वर्गीय कुंअर चन्‍द्र प्रकाश सिंह की प्रेरणा से 18 अक्‍टूबर, 1980 को अंतरराष्‍ट्रीय हिन्‍दी समिति की स्‍थापना हुई । हिन्‍दी शिक्षण के अलावा अन्‍य आयोजनों, कवि सम्‍मेलनों, पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन में इस संस्‍था ने एक नए युग का सूत्रपात किया । स्‍वर्गीय रामेश्‍वर अशांत ने वर्ष 1989 में विश्‍व हिन्‍दी समिति की स्‍थापना की और विश्‍वा नामक त्रैमासिक पत्रिका का प्रकाशन आरम्‍भ किया और इसके बाद सौरभ त्रैमासिक पत्रिका भी निकाली । डॉ राम चौधरी की अध्‍यक्षता में विश्‍व हिन्‍दी न्‍यास की स्‍थापना के बाद उसका त्रैमासिक प्रकाशन हिन्‍दी जगत के नाम से निकलता है और पूरी दुनिया में पढ़ा जाता है । इसी कड़ी में श्री श्‍याम त्रिपाठी के नेतृत्‍व में हिन्‍दी चेतना पत्रिका कनाडा से प्रकाशित की जा रही है और वर्तमान में इसका संपादन श्रीमती सुधा ओम धींगरा कर रही हैं । विश्‍व हिन्‍दी न्‍यास की त्रैमासिक विज्ञान प्रकाश और बाल जगत तथा डॉ वेद प्रकाश वटुक की अन्‍यथा पत्रिका भी प्रकाशित हो रही हैं । निश्शुल्‍क हिन्‍दी साप्‍ताहिक नमस्‍ते यूएसए का प्रकाशन सनीवेल हिन्‍दू मंदिर ने प्रारंभ किया है और इसका वितरण हजारों की संख्‍या में हो रहा है ।


परिमाण और प्रसार की दृष्‍टि से देखें तो नव प्रवास के देशों में अमेरिका में प्रवासी हिन्‍दी लेखन की परंपरा बहुत पुष्‍ट है । मॉरीशस को छोड़कर, भारत से बाहर इतना साहित्‍य सृजन और प्रकाशन कहीं भी नहीं हो रहा है । गीतकार इंदुकान्‍त शुक्‍ल से लेकर सुस्‍थापित कवि श्री गुलाब खंडेलवाल, डॉ विजयकुमार मेहता, श्री ओम प्रकाश गौड़ प्रवासी, रामेश्‍वर अशांत, डॉ वेद प्रकाश वटुक तक और नई शृंखला में सुधा ओम धींगरा, हिमांशु पाठक, धनंजय कुमार, राकेश खंडेलवाल, सुरेन्‍द्र कुमार तिवारी, अनंत कौर, अंजना संधीर और नरेन्‍द्र सेठी ने अपने लिए प्रवासी हिन्‍दी कवियों में जगह बनाई है। कथा साहित्‍य में स्‍वर्गीय सोमा वीरा, उषा प्रियंवदा, सुषम बेदी, उमेश अग्‍निहोत्री ने विश्‍व हिन्‍दी प्रेमियों का ध्‍यान आकर्षित किया है । लेखक के पास उपलब्‍ध सूचना के अनुसार अमेरिका में अब तक 132 काव्‍य संग्रहों और 52 कहानी संकलनों के अलावा 28 उपन्‍यास, 13 नाटक/एकांकी, 5 लेख संग्रह, इतिहास एवं विविध विषयों पर 13 पुस्‍तकें, 4 संस्‍मरण/यात्रावृत्‍त प्रकाशित हुए हैं ।


इसी के साथ कनाडा में श्रीमती मधु वार्ष्‍णेय, श्री नरेन्‍द्र भागी, आचार्य शिव शंकर द्विवेदी, राज शर्मा, श्री श्‍याम त्रिपाठी, श्री श्रीनाथ द्विवेदी, श्री समीर लाल, जसवीर कलरवी, डॉ भूपेन्‍द्र सिंह, श्री हरदेव सोढी, श्री ललित अहलूवालिया, श्री भुवनेश्‍वरी पांडेय, श्री अमर सिंह जैन और श्री कृष्‍ण कुमार सैनी ने लगभग 72 पुस्‍तकें प्रकाशित कराई हैं, जिनमें काव्‍य संग्रह, कहानी संकलन, उपन्‍यास, व्‍यंग्‍य संग्रह, संस्‍मरण आदि शामिल हैं ।


ब्रिटेन
नव प्रवास के देशों में भारत के लिए अमेरिका और ब्रिटेन का स्‍थान विशिष्‍ट है । अमेरिका में हिन्‍दी लेखन के बारे में चर्चा करते हुए इसी लेख में अन्‍यत्र यह उल्‍लेख किया गया है कि प्रवासी हिन्‍दी लेखन में ब्रिटेन का स्‍थान अद्वितीय है । राजनैतिक रूप से भी, शासक और शासित के बीच बहुत अच्‍छे संबंधों के दो मजबूत उदाहरण हैं- अमेरिका और ब्रिटेन तथा ब्रिटेन और भारत के संबंध । विश्‍व की सबसे बड़ी अर्थ-व्‍यवस्था-अमेरिका, लोकतंत्र और मैग्‍नाकार्टा की मातृभूमि-ब्रिटेन और विश्‍व के सबसे बड़े लोकतंत्र- भारत के बीच गहराते संबंध मात्र संयोग नहीं हैं। इसमें प्रवासी भारतीयों के उस विशाल परिवार की अपनी गहरी भूमिका है जिसके सदस्‍यों की संख्‍या इन देशों में क्रमश: 25 लाख और 16 लाख है । ब्रिटेन में प्रवासी भारतीयों ने न केवल सामाजिक क्षेत्र में अपितु आर्थिक क्षेत्र में भी अपनी साख बनाई है और औसत भारतीय का योगदान, यहाँ की अर्थव्‍यवस्‍था में, सामान्‍य से दुगुना है । उदारीकरण के बाद भारत की आर्थिक शक्‍ति में अभूतपूर्व बढ़ोत्‍तरी हुई है और इसी के साथ भारत को एक नई दृष्‍टि से देखा जाने लगा है । ब्रिटेन के साथ भारत के आर्थिक, सैन्‍य, राजनयिक, व्‍यापारिक संबंधों में एक नई चेतना आई है और भारत के लोगों, भारत की संस्‍कृति, भारत की भाषाओं, यहाँ तक कि भारत के भोजन के बारे में भी ब्रिटिश समाज की रुचि बढ़ी है। मैं यह मानता हूँ कि विश्‍व में किसी भी प्रकार के व्‍यापार की तुलना में भाषा का और भाषा-आधारित उत्‍पादों का व्‍यापार सबसे बड़ा है । उत्‍पाद की स्‍वीकार्यता से पहले भाषा की स्‍वीकार्यता का अपना महत्‍व है और यह भी सत्‍य है कि व्‍यापारिक संबंध हमेशा एकतरफा नहीं रह सकते । यदि अंग्रेजी के प्रसार से भारत में अंग्रेजी-भाषी देशों को व्‍यापार में सुविधा होती है तो भारतीय भाषाओं को जानने से उन्‍हें गहरी पैठ मिलती है । वे गाँव गाँव जा कर कह सकते हैं- ये दिल माँगे मोर, फिर भी – रिन की चमकार, बार बार लगातार का मुकाबला मोर नहीं कर सकता ।


अस्‍तु, ब्रिटेन में हिन्‍दी लेखन की शुरुआत पत्रकारिता से हुई । आज से लगभग 128 वर्ष पहले वर्ष 1883 में कालाकांकर नरेश राजा रामपाल सिंह के संपादन में पहला हिन्‍दी अंग्रेजी त्रैमासिक समाचार पत्र हिन्‍दोस्‍थान प्रकाशित हुआ । हालांकि आगे चलकर 1884 में इंग्‍लैण्‍ड में यह केवल अंग्रेजी में निकलने लगा लेकिन भारत में 1885 से हिन्‍दी में प्रकाशित होने लगा । इसके बाद हिन्‍दी प्रचार परिषद, लन्‍दन के तत्‍वावधान में वर्ष 1964 में प्रवासिनी त्रैमासिक पत्रिका का प्रकाशन होने लगा । इसका प्रकाशन ज्‍योति प्रिंटर, 40, स्‍टार स्‍ट्रीट, लन्‍दन से होता था और इसका कार्यालय था- 15, क्रॉच हॉल रोड, लन्‍दन एन 8 पर। इसके संपादक थे श्री धर्मेन्‍द्र गौतम और पत्रिका में श्री राधेश्‍याम सोनी, श्री जगदीश मित्र कौशल, श्री बैरागी, श्री मोहन गुप्‍त, श्री विनोद पांडे, श्री सत्‍यदेव प्रिंजा, अबू अब्राहम, कान्‍ता पटेल आदि का लेखकीय सहयोग होता था ।


इसके बाद जून, 1964 में श्री रमेश कुमार सोनी ने मिलाप वीकली पत्र का संपादन और प्रकाशन प्रारंभ किया तथा वर्ष 1966 से इसमें हिन्‍दी के भी दो पृष्‍ठ दिए जाने लगे । आपको यह जानकर आश्‍चर्य होगा कि आठ पृष्‍ठों का यह साप्‍ताहिक समाचार पत्र अब भी प्रकाशित होता है और इस प्रकार ब्रिटेन में इसे उर्दू-हिन्‍दी का सर्वाधिक दीर्घ अवधि तक प्रकाशित होने वाला अखबार कहना उचित ही होगा । श्री जगदीश मित्र कौशल के संपादन में 23 मार्च, 1971 को लन्‍दन से ही अमरदीप साप्‍ताहिक का प्रकाशन प्रारंभ हुआ और लगभग 32 वर्ष तक प्रकाशन के बाद यह वर्ष 2003 में बन्‍द हो गया । अमरदीप साप्‍ताहिक के महत्‍व को देखते हुए श्री जगदीश मित्र कौशल को भारतीय उच्‍चायोग की ओर से पहला आचार्य महावीर प्रसार द्विवेदी हिन्‍दी पत्रकारिता सम्‍मान वर्ष 2006 के लिए दिया गया । पत्रिका चेतक का प्रकाशन भी श्री नरेश भारतीय के संपादन में कुछ समय के लिए हुआ । तत्‍पश्‍चात् वर्ष 1997 में त्रैमासिक पत्रिका पुरवाई का प्रकाशन, डॉ पदमेश गुप्‍त के संपादन में शुरू हुआ जो अभी तक जारी है । हिन्‍दी के लिए पूर्णत: समर्पित इस पत्रिका ने ब्रिटेन के हिन्‍दी रचनाकारों को एक मंच दिया । इस बीच, भारतीय उच्‍चायोग की छमाही पत्रिका भारत भवन का प्रकाशन भी शुरू हुआ जो रुक-रुककर जारी है । श्रीमती शैल अग्रवाल ने लेखनी नामक एक मासिक वैब पत्रिका का प्रकाशन भी वर्ष 2008 से प्रारंभ किया है । 


साहित्‍यिक रचनाओं में पहली प्रकाशित रचना डॉ सत्‍येन्‍द्र श्रीवास्‍तव की है – मिसेज जोन्‍स और उनकी वह गली । यह एक लंबी कविता है । इसके बाद डॉ निखिल कौशिक का काव्‍य संकलन- तुम लन्‍दन आना चाहते हो, वर्ष 1987 में प्रकाशित हुआ । सच तो यह है कि ब्रिटेन के प्रवासी रचनाकारों का कुल इतिहास लगभग 30 वर्ष का है जिसमें कि उनकी रचनाएँ पुस्‍तकाकार प्रकाशित हुई हैं । प्रकाशन की गति से देखें तो ब्रिटेन में हिन्‍दी साहित्‍य का भविष्‍य काफी उज्‍ज्‍वल दिखाई देता है । अभी तक ब्रिटेन में कुल 106 काव्‍य संग्रह, 12 उपन्‍यास, 06 नाटक/एकांकी, 06 निबंध/जीवनियाँ, 07 यात्रावृत्‍त/संस्‍मरण, 36 कहानी संग्रह, इतिहास/धर्म/दर्शन पर 05 ग्रन्‍थ, शोध/हिन्‍दी शिक्षण/विविध ग्रन्‍थों के रूप में कुल 25 पुस्‍तकों का प्रकाशन हो चुका है ।


ब्रिटेन के प्रमुख रचनाकारों में शामिल हैं- डॉ सत्‍येन्‍द्र श्रीवास्‍तव, श्री प्राण शर्मा, श्रीमती उषा राजे सक्‍सेना, डॉ कृष्‍ण कुमार, श्री तेजिन्‍दर शर्मा, डॉ. कविता वाचक्नवी, डॉ निखिल कौशिक, श्री मोहन राणा, श्रीमती दिव्‍या माथुर, (स्वर्गीय) डॉ गौतम सचदेव, डॉ पद्मेश गुप्‍त, श्री महेन्‍द्र दवेसर दीपक, श्री रमेश पटेल, श्रीमती शैल अग्रवाल, श्री भारतेन्‍दु विमल, श्रीमती उषा वर्मा, श्रीमती कादम्‍बरी मेहरा, श्रीमती पुष्‍पा भार्गव, श्रीमती विद्या मायर, श्रीमती कीर्ति चौधरी, श्रीमती प्रियम्‍वदा मिश्रा, श्रीमती अरुणा सभरवाल, श्रीमती श्‍यामा कुमार, डॉ इन्‍दिरा आनंद, श्री वेद मित्र मोहला, श्रीमती नीना पॉल, श्री नरेश अरोड़ा, श्रीमती अचला शर्मा, श्रीमती चंचल जैन, श्रीमती स्‍वर्ण तलवाड़, डॉ कृष्‍ण कन्‍हैया, श्रीमती जय वर्मा, श्री धर्मपाल शर्मा, श्री सुरेन्‍द्र नाथ लाल, श्री रमेश वैश्‍य मुरादाबादी, श्री सोहन राही, श्रीमती रमा जोशी, डॉ श्रीपति उपाध्‍याय, श्री एस पी गुप्‍ता, श्री जगभूषण खरबन्‍दा, श्री यश गुप्‍ता, श्री जे एस नागरा, श्री मंगत भारद्वाज, श्री जगदीश मित्र, श्री रिफत शमीम, श्री इस्‍माइल चुनारा, श्रीमती तोषी अमृता, श्रीमती राज मोदगिल, श्रीमती उर्मिल भारद्वाज, श्रीमती निर्मल परींजा आदि ।


नव प्रवास के अन्‍य देश हैं- न्‍यूजीलैण्‍ड, आस्‍ट्रेलिया, नार्वे, डेनमार्क, सउदी अरब, शरजाह, डेनमार्क, जापान आदि देश । यूरोप के कई अन्‍य देशों में भी प्रवासी भारतीय अल्‍प संख्‍या में हैं और हिन्‍दी लेखन भी कर रहे हैं परन्‍तु उनका उल्‍लेख स्‍थानाभाव के कारण इस लेख में नहीं किया जा रहा है ।


निष्‍कर्षत: यह निर्विवाद सत्‍य है कि भारत से बाहर सबसे अधिक मात्रा और संभवत: सबसे अधिक गुणवत्‍ता वाला लेखन मॉरीशस में ही हुआ है और हो रहा है । ऐसा कहते हुए मेरे मन में अमेरिका के प्रवासी/निवासी रचनाकारों के विपुल साहित्‍य सृजन की उपेक्षा का भाव बिल्‍कुल नहीं है और न ही ब्रिटेन में हिन्‍दी साहित्‍य सृजन के विकासशील लेकिन सशक्‍त बिरवे को दृष्‍टि से ओझल करने का ही भाव है । जब भी हम मॉरीशस और ब्रिटेन में हिन्‍दी साहित्‍य की बात करें तो इन दोनों देशों के भौगोलिक क्षेत्रफल के सापेक्ष अमेरिका के क्षेत्रफल और वहाँ प्रवासी भारतीयों के संख्‍याबल को भी ध्‍यान में रखना होगा । इसी अर्थ में मैंने कहा है कि हिन्‍दी में सर्वाधिक साहित्‍य सृजन मॉरीशस में हो रहा है। इस दृष्‍टि से देखें तो ब्रिटेन में हिन्‍दी साहित्‍य सृजन का महत्‍व अपने आप सामने आ जाएगा ।

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संदर्भ ग्रन्‍थ सूची
1. विदेशों में हिन्‍दी पत्रकारिता, डॉ पवन कुमार जैन, 1993 ।
2. चेतना का आत्‍मसंघर्ष- हिन्‍दी की इक्‍कीसवीं सदी, संपादक- श्री कन्‍हैयालाल नन्‍दन, 2007।
3. विश्व हिन्‍दी रचना, भारतीय सांस्‍कृतिक संबंध परिषद, 2003 ।
4. स्‍मारिका, सातवाँ विश्‍व हिन्‍दी सम्‍मेलन, सूरीनाम, 2003 ।
5. विश्‍व हिन्‍दी पत्रिका, विश्‍व हिन्‍दी सचिवालय, 2009 ।
6. प्रवासी संसार, संपादक श्री राकेश पांडेय, विश्‍व हिन्‍दी सम्‍मेलन विशेषांक, 2007 ।
7. विश्‍व हिन्‍दी पत्रिका, विश्‍व हिन्‍दी सचिवालय, 2010 ।
8. ब्रिटेन में हिन्‍दी, श्रीमती उषा राजे सक्‍सेना, 2005 ।
9. प्रवासी भारतीयों की हिन्‍दी सेवा, श्रीमती कैलाश कुमारी सहाय ।
10. हिन्‍दी की विश्‍व यात्रा, प्रो सुरेश ऋतुपर्ण, 2005 ।
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